
मुंबई का मेयर मराठी भाषी होना उपयुक्त
नवभारत डिजिटल डेस्क: सवाल यह नहीं है कि कोई उत्तर भारतीय मुंबई का मेयर बनने में सक्षम है या नहीं? सवाल है क्या हर सक्षम व्यक्ति को सांस्कृतिक संदर्भों और प्रतीकों को पराजित करके अपना वर्चस्व कायम करना चाहिए? अगर वाकई मुंबई के स्थानीय मराठी और दूसरी भाषाओं के लोग भी हर हाल में किसी अद्भुत व्यक्तित्व को इस पद पर बिठाना चाहें, तो यह शहर के लोगों का बड़प्पन होगा। गणितीय समीकरणों से सियासी सक्रियता के जरिए स्थानीय अस्मिता की अनदेखी करके उसके हिस्से का नेतृत्व छीन लेना लोकतंत्र का कतई सम्मान नहीं होगा। अगर हम मुंबई के इतिहास को खंगालें तो वह मराठी श्रम का इतिहास है।
यहां की कपड़ा मिलों से लेकर बंदरगाहों तक मराठी अस्मिता की सांस्कृतिक कड़ियां बिखरी पड़ी हैं। औपनिवेशिक दौर में ये मराठी अस्मिता और विद्रोह की चेतना ही थी, जिसने उस दौर के शासकों की जड़ें हिलाईं। ऐसे में यदि आज कोई उत्तर भारतीय चुनाव प्रक्रिया के जरिए मुंबई का मेयर बनता है, तो इसे संवैधानिक तरीके से कोई रोक नहीं सकता, लेकिन स्थानीय संस्कृति और अस्मिता को धक्का लगेगा और किसी भी लोकतंत्र में इतनी संवेदनशीलता तो होनी ही चाहिए, जो स्थानीयता में धड़क सके। इसलिए महज चुनाव जीतने और चुनाव जीतकर संख्या बल की बदौलत किसी विशेष सांस्कृतिक खंड पर बाहरी दुनिया के व्यक्ति को थोप देना, भले लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उल्लंघन न हो, लेकिन लोकतांत्रिक संवेदना की निर्मम हत्या होगी। इसलिए मुंबई के सतरंगी स्वभाव में मराठी अग्रता को बरकरार रखा जाना चाहिए।
यह तर्क गणितीय और संवैधानिक दृष्टि से सही होगा कि जिसका बहुमत होगा, उसी का शासक होगा। लेकिन फिर तो यह चुनावी आड़ में स्थानीयता की उपेक्षा होगी। शासन संवेदनशील और मर्यादित भी होना चाहिए। ऐसे में बहुसंख्यक लोग स्थानीय संस्कृति के प्रति संवेदनशील नहीं रहेंगे और धीरे-धीरे स्थानीय भाषा और संस्कृति दोयम दर्जे की होकर अपना असर और अस्तित्व खो देंगी। कोई नहीं जानता इससे बाहरी बनाम स्थानीय द्वेष किस हद तक बढ़ सकता है। क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए। बाहरी चाहे जितनी बड़ी संख्या में आ जाएं, अगर स्थानीय लोगों को वो भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे, तो स्थानीय लोग विद्रोह करने पर उतारू हो जाएंगे। एक अलिखित शर्त के तौर पर होना चाहिए कि शासन चाहे जिस पार्टी का हो, हर पार्टी और हर स्थानीय मतदाता को स्थानीय लोगों की संवेदना और भावना का सम्मान करना चाहिए।
महाराष्ट्र के बहुसंख्यक वर्गों को अगर लगेगा कि महज संख्या ज्यादा होने के कारण उन्हें बाहरी लोगों ने उनके ही डीएनए से बेदखल कर दिया है, तो यह बात सहजता से किसी के दिल में नहीं पचेगी बल्कि यह सच्चाई स्थानीयता को कुंठित करेगी और यह कुंठा लोकतंत्र को कमजोर करेगी। इसलिए संख्या में ज्यादा होने के बावजूद बाहरी लोगों को स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति न केवल संवेदनशील होना चाहिए बल्कि उसे उसका पहला हक हासिल करने में मददगार होना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मुंबई को आधुनिक कारोबार का शहर बनाने में उत्तर भारतीयों का भारी योगदान निर्विवाद है। वे शहर के आर्थिक धड़कनों का हिस्सा हैं, परंतु प्रतिनिधित्व में प्राथमिकता स्थानीय समाज को इसलिए भी मिलनी चाहिए, क्योंकि बाहरी लोग इन्हीं लोगों की लोकतांत्रिकता के तहत यहां फले-फूले हैं। ऐसे में अब उन्हें स्थानीयता की रक्षा करनी चाहिए।
ये भी पढ़ें- ‘नवभारत विशेष’ की अन्य रोचक ख़बरों और लेखों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
कॉस्मोपोलिटिन शहर मुंबई महज कंकरीट का जंगल नहीं है, है, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक भू-खंड है। यह शहर भारत की आर्थिक धड़कन है पर इसकी अस्मिता मराठी से ही बनती है। कारोबारी जरूरतों के कारण उत्तर भारतीय शहरों की तरह यहां हिंदी बोली जाती है। ऐसे में भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह का उत्तर भारतीयों से यह कहना कि महानगर पालिका के चुनाव में इतने ज्यादा नगर सेवक चुनिए कि मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय समुदाय से ही हो, क्षेत्रीय अस्मिता पर आघात है।
लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा






