नवभारत विशेष: अब क्या होगा राष्ट्रवादी कांग्रेस का भविष्य ?

Maharashtra NCP Crisis: अजित पवार के निधन से एनसीपी के सामने नेतृत्व और सत्ता संतुलन का संकट खड़ा हो गया है। उपमुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर अब बड़ा सियासी मंथन शुरू होगा।
Navbharat Special: What will be the future of the Nationalist Congress Party now?
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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नवभारत डिजिटल डेस्क: अजीत पवार के आकस्मिक निधन से महाराष्ट्र की राजनीति काफी हद तक प्रभावित हो सकती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को ही राजनीति की गोटियां नए सिरे से बिछाने की नौबत आएगी। एनसीपी का तंबू अजीत पवार जैसे मजबूत स्तंभ पर टिका हुआ था। जब अजीत ने अपने चाचा शरद पवार का साथ छोड़ा, तो अधिकांश विधायक उनके साथ आ गए थे।

विधानसभा में 41 विधायकों का नेतृत्व करने वाले अजीत दादा का राज्य सरकार में बड़ा दबदबा था। अब उनके देहावसान के बाद राज्य का उपमुख्यमंत्री पद व वित्तमंत्री पद किसे मिलेगा, यह बड़ा प्रश्नचिन्ह एनसीपी के सामने है। राज्य मंत्रिमंडल में पवार घराने का एक भी मंत्री नहीं है। ऐसी स्थिति में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा।

इसका निर्णय शीघ्र ही लेना होगा। एनसीपी की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के लिए किसका नाम तय होगा ? मंत्रिमंडल में पवार परिवार में से किसे शामिल किया जाएगा। पार्टी अध्यक्ष पद पवार घराने में से किसके पास जाएगा या कोई अन्य नेता इस जिम्मेदारी को संभालेगा? एनसीपी के सामने अजीत पवार के बगैर अपना अस्तित्व सिद्ध करने की बड़ी चुनौती होगी। अजीत पार्टी के अध्यक्ष थे तो प्रफुल पटेल राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष थे।

इसलिए संभावना है कि पटेल को पार्टी का नेतृत्व मिलेगा। देखना होगा कि प्रफुल पटेल व महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे पार्टी के बारे में क्या निर्णय लेते हैं। वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल के नाम को लेकर भी चर्चा चल रही है। कुछ क्षेत्रों की राय है कि इस भीषण आघात से संभलने के बाद पार्टी का नेतृत्व व उपमुख्यमंत्री पद अजीत की पत्नी सुनेत्रा पवार को दिया जाना चाहिए, यह महिला नेतृत्व की मिसाल रहेगी।

सुनेत्रा बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं और पार्टी की कुछ जिम्मेदारियां लेने की उन्होंने शुरुआत भी की थी। पार्टीजनों की सहानुभूति भी उनके पक्ष में होगी। यह भी विचार किया जा रहा है कि क्या एनसीपी के दोनों गुट एकजुट हो सकते हैं? 85 वर्ष के शरद पवार के लिए पहले के समान सक्रियता दिखाने की संभावना नहीं है।

उन्हें भी सोचना होगा कि एकीकरण में राजनीतिक लाभ है क्योंकि अलग रहने के बाद उनके साथ गिने-चुने विधायक रह गए हैं। एनसीपी के दोनों गुट स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान इतने निकट आ गए थे कि शरद पवार की पार्टी ने अनेक स्थानों पर अजीत पवार की पार्टी के चुनाव चिन्ह घड़ी पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था।

पिंपरी-चिंचवड में एनसीपी के दोनों गुटों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उन्होंने यह गठजोड़ पुणे जिला परिषद व पंचायत समिति चुनावों में भी जारी रखा। तब कहा जा रहा था कि जिला परिषद चुनाव हो जाने के कुछ महीने बाद पवार चाचा-भतीजे की पार्टी एकजुट हो जाएगी। तब अजीत पचार की पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कहा था कि हम सभी प्रदीर्घ चर्चा करने के बाद अलग हुए थे।

एकत्र होने का निर्णय हमें अंधेरे में रखकर नहीं लिया जाना चाहिए, कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना होगा। ऐसी परिस्थिति में पवार परिवार कैसा निर्णय लेता है, इस पर सबका ध्यान लगा है। अजीत पवार के चले जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में जो रिक्तता आई है, उसने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। शरद पवार ने बीजेपी के साथ सीधे गठजोड़ से आज तक अपने को दूर रखा है।

अजीत पवार के निधन ने दोनों गुटों को असमंजस में डाल दिया है कि क्या चुनाव संबंधी गठबंधन को जारी रखा जाहए या महाराष्ट्र में 2029 में होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए विलय की ओर बढ़ा जाए, एनसीपी के दोनों गुटों में सदस्य दुख में तो एकजुट हैं लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति को देखते हुए दोनों प्रतिद्वंद्वी खेमे में हैं। अजीत पवार की अनुपस्थिति में विलय कठिन प्रतीत होता है क्योंकि अपने गुट की प्रेरकशक्ति वहीं थे।

अजीत पवार के निधन के बाद उठते सवाल

अजीत पवार के चले जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में जो रिक्तता आई है, उसने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। शरद पवार ने बीजेपी के साथ सीधे गठजोड़ से आज तक अपने को दूर रखा है। अजीत पवार के निधन ने दोनों गुटों को असमंजस में डाल दिया है।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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