ये बात डायरी में लिख लो, जिंदगी भर काम आएगी, Shri Premanand Ji Maharaj की अमूल्य सीख

Bhakti Marg: दुनिया में जो भी है, वह स्थायी नहीं है। घर, धन, पति-पत्नी, संतान, मान-सम्मान सब यहीं रह जाना है। ऐसे में मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह इन नश्वर चीजों को ही अपना सबकुछ मान बैठता है
Write this down in your diary; it will be useful throughout your life. This is a priceless lesson from Shri Premanand Ji Maharaj.
Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
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Renunciation of Maya: दुनिया में जो भी है, वह स्थायी नहीं है। घर, धन, पति-पत्नी, संतान, मान-सम्मान सब यहीं रह जाना है। ऐसे में मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह इन नश्वर चीजों को ही अपना सबकुछ मान बैठता है। Shri Premanand Ji Maharaj बताते हैं कि जो व्यक्ति इन क्षणभंगुर वस्तुओं में आसक्त होकर जीवन जीता है, वह आत्मकल्याण के मार्ग से भटक जाता है।

माया के दलदल से बचने का एकमात्र रास्ता

महाराज जी के अनुसार, मनुष्य को उच्छृंखल या अहंकार से भरा जीवन नहीं जीना चाहिए। भगवान का आश्रय लेना, धर्म के मार्ग पर चलना और निरंतर नाम जप करना ही आत्मा के परम कल्याण का मार्ग है। यही साधना मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर सकती है।

भोग का खतरनाक दलदल

इंद्रियों के विषय भोग एक ऐसे दलदल की तरह हैं, जिसमें उतरना आसान है लेकिन निकलना लगभग असंभव। एक दिन की लापरवाही जीवन भर की आदत बन सकती है। जो सिर्फ "स्वाद" लेने के लिए इसमें उतरता है, वह धीरे-धीरे और गहराई में धंसता चला जाता है। इस दलदल से केवल गुरु कृपा या भगवान की अनुकंपा ही बाहर निकाल सकती है।

माया के तीन सबसे बड़े जाल

Shri Premanand Ji Maharaj तीन बातों से विशेष सावधान रहने को कहते हैं:

  • कंचन (धन): धन का संग्रह साधक के पतन का कारण बन सकता है। सच्चा त्याग यही है कि प्रभु पर भरोसा रखा जाए।
  • कामिनी (भोग-विलास): इंद्रिय सुख और आकर्षण साधक की साधना को कमजोर कर देते हैं।
  • कीर्ति (यश): धन और काम से भी कठिन है नाम और प्रतिष्ठा का त्याग। यही सबसे खतरनाक तलवार है।

निंदा से दूरी, आत्मशुद्धि जरूरी

महाराज जी कहते हैं कि निंदा विशेषकर ब्रजवासियों और वैष्णवों की, घोर अपराध है। दूसरों की कमियां देखने के बजाय अपने भीतर की अशुद्धियों को देखना चाहिए। जब मनुष्य स्वयं सुधरने लगता है, तब उसे हर किसी में भगवान के दर्शन होने लगते हैं।

असली रिश्ते कौन से हैं?

  • सत्य की दृष्टि से वही आपके अपने हैं, जो आपको भगवान की ओर ले जाएं।
  • गुरु वही सच्चा गुरु है, जो शिष्य को मृत्यु से पार कर दे।
  • जो माता-पिता या जीवनसाथी भक्ति और नाम-स्मरण से रोकें, वे हितैषी नहीं कहे जा सकते।

जीवन बदलने की सीख

दुनिया को सुधारने में जीवन न गंवाएं, अपनी साधना पर ध्यान दें। तीव्र नाम जप से पुराने कर्म नष्ट हो सकते हैं। यदि अनजाने में अपराध हो जाए, तो गुरु की शरण ही सबसे बड़ा सहारा है। गुरु कृपा से ही कंचन, कामिनी और कीर्ति की कठिन घाटियों को पार किया जा सकता है।

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