

Teachings of Shri Premanand Ji Maharaj: "हर काम में सफलता मिलती चली जाएगी" यह वाक्य केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला मंत्र है। श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि संत जब बोलते हैं, डांटते हैं या स्नेह दिखाते हैं, तो उसके पीछे कोई व्यक्तिगत भाव नहीं होता। उनका उद्देश्य केवल इतना होता है कि मन, जो संसारिक मोह में बिखरा हुआ है, वह श्रीजी (राधारानी) के चरणों में समर्पित हो जाए। यही समर्पण सच्ची शांति और उन्नति की शुरुआत है।
महाराज समझाते हैं कि हम माया के खिलौनों से खुश हैं, लेकिन समय ने इन रिश्तों को पहले ही काट रखा है। अगर इन्हीं आसक्तियों को पकड़े-पकड़े संसार छोड़ दिया, तो अंत दुखद होगा। लेकिन यदि यही प्रेम प्रिय-लाल (राधा-कृष्ण) को समर्पित कर दिया जाए, तो वही प्रेम भक्ति और मुक्ति का द्वार खोल देता है। माता-पिता या जीवनसाथी से जैसा प्रेम है, वैसा ही प्रेम प्रभु चाहते हैं बस दृष्टि बदलनी है।
निवृत्ति मार्ग में दो नावों पर पैर नहीं रखा जा सकता। यहां पूरा भरोसा ईश्वर पर रखना होता है। श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का उदाहरण देते हुए महाराज बताते हैं कि धनवान माता-पिता के पुत्र होते हुए भी उन्होंने वैराग्य के लिए राजसी सुख त्याग दिए। यहां तक कि वे ऐसा अन्न ग्रहण करते थे, जिसे गायें भी नहीं खाती थीं इतनी दृढ़ थी उनकी साधना। इस मार्ग में तीन बातें जरूरी हैं: • अहंकार का त्याग: स्वयं को तिनके से भी छोटा मानना • संसारिक गपशप से दूरी: जो हृदय में ताप पैदा करे • ईश्वर पर भरोसा: "जो पल में ब्रह्मांड रच दे, वह आपका पालन क्यों नहीं करेगा?"
कठिन समय से डरना नहीं चाहिए। जब संसार का कोई सहारा काम नहीं आता, तभी सच्ची शरणागति पकती है। द्रौपदी और गजेंद्र को प्रभु का साक्षात्कार भी ऐसे ही क्षणों में हुआ। महाराज स्वयं बताते हैं कि वे एक रात संसारिक सहारों से भागकर श्री वृंदावन आ गए जहां दृष्टि केवल प्रभु पर टिक गई।
यह माया का खेल है कि संतों को भी निंदा और द्वेष झेलना पड़ता है मीरा, प्रह्लाद जैसे उदाहरण सामने हैं। इसका उपचार है नाम जप। नाम जप दृष्टि बदल देता है; सच्चा साधक इतना करुणामय हो जाता है कि वह पापी से भी प्रेम कर उसे ईश्वर से जोड़ना चाहता है।
महाराज कहते हैं श्री धाम वृंदावन की शरण लो, स्वयं को सबसे छोटा मानो और हर जीव को प्रणाम करो। गुरु और श्रीजी में अटूट विश्वास रखोगे, तो भीतर आध्यात्मिक प्रकाश जागेगा और मन संसारिक वासनाओं से मुक्त होकर गहरी शांति पाएगा।
जीवन यात्रा उस व्यक्ति जैसी है जो गहरे गड्ढे में गिर गया हो। गिरने की ताकत तो हमारी भूलों में थी, लेकिन बाहर निकलने की शक्ति हमारे पास नहीं। उठने और स्थिर रहने की शक्ति केवल गुरु और ईश्वर से मिलती है अहंकार से नहीं।