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क्यों मनाई जाती है ‘देव दिवाली’, जानिए क्यों त्रिपुरासुर के वध से जुड़ा है इस पर्व का संबंध
- Written By: सीमा कुमारी
Lord Shiva Tripurasur: देव दिवाली 'त्रिपुरासुर' के वध के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध इसी दिन किया था।

ये है देव दीवाली की पौराणिक कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Kashi Dev Diwali: पूरे देशभर में आज कार्तिक पूर्णिमा के साथ ही देव दीपावली का महापर्व भी मनाई जा रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली देव दीपावली की सबसे ज्यादा रौनक बोलिए या धूम काशी नगरी, यानि वाराणसी में देखने लायक होती है।
यहां पर काशी के घाट पर लाखों की संख्या में दीप जलाकर देव दीपावली मनाई जाएगी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी देवता धरती लोक पर आते हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। देव दिवाली के दिन स्नान-दान और दीप दान का विशेष महत्व बताया गया है।
आपको बता दें, देव दिवाली का महत्व केवल काशी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत में भक्ति, पुण्य और प्रकाश का प्रतीक बन चुका है। इस दिन लोग गंगा स्नान करते हैं, मंदिरों में दीप जलाते हैं और घर के द्वार पर प्रकाश करते हैं।
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ऐसा माना जाता है कि इस दिन जलाया गया दीप न सिर्फ अंधकार को मिटाता है, बल्कि पापों से मुक्ति और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग भी खोलता है। पौराणिक मान्यता की बात करें तो, देव दिवाली के पीछे एक रोचक कथा भी जुड़ी हुई है, जिसकी वजह से इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। तो चलिए जानते हैं देव दिवाली की पौराणिक कथा के बारे में-
ये है देव दीवाली की पौराणिक कथा
शिवपुराण में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, त्रिपुरासुर नामक राक्षस बहुत ही शक्तिशाली था। कहा जाता है कि राक्षस तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली।
इन तीनों को मिलाकर ही त्रिपुरासुर राक्षस बना था। ये तीनों अपनी असाधारण शक्ति और अहंकार के कारण देवताओं के लिए संकट बन गए थे। जब भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया, तो उसके इन तीनों पुत्रों ने तिशोध की अग्नि में तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था।
ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता छोड़कर कोई भी वरदान मांगने को कहा। तब तीनों ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा जो लगभग अमरता के समान ही था। उन्होंने कहा कि उनकी मृत्यु तभी संभव हो जब तीनों एक ही पंक्ति में हों, अभिजीत नक्षत्र का समय हो और कोई एक ही तीर से तीनों का वध करे।
ब्रह्मा जी ने यह वरदान स्वीकार कर लिया। इसके बाद त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था- देवता, ऋषि और मनुष्य सभी उनके अत्याचारों से त्रस्त हो गए थे।
जब अत्याचार चरम सीमा पर पहुंच गया, तो देवताओं ने भगवान शिव से शरण ली। महादेव ने त्रिपुरासुर का अंत करने का संकल्प लिया। उन्होंने पृथ्वी को अपना रथ बनाया, सूर्य और चंद्रमा को उसके पहिए, मेरु पर्वत को धनुष और वासुकी नाग को धनुष की डोरी बनाया।
उस समय भगवान विष्णु स्वयं बाण बने। जैसे ही अभिजीत नक्षत्र का समय आया, भगवान शिव ने एक ही तीर से त्रिपुरासुर- तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली, तीनों का संहार कर दिया।
ये भी पढ़ें-गुरू नानक देव जी के वो 10 अनमोल विचार जो बदल सकती है आपकी ज़िंदगी, ज़रूर पढ़ें और अमल करके देखें
कहा जाता है, इस विजय के बाद देवताओं ने दीप जलाकर हर्ष मनाया और तभी से कार्तिक पूर्णिमा के दिन ‘देव दीपावली’ मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह पर्व प्रकाश की उस विजय का प्रतीक है जब भगवान शिव ने अंधकार और अहंकार दोनों का अंत किया।
Why is dev diwali celebrated
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