
Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Illusion And Attachment: यह सच्ची घटना सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। संत श्री प्रेमानंद जी महाराज अक्सर मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल की ओर इशारा करते हैं हम इस संसार को ही सब कुछ मान लेते हैं। काम, क्रोध, लोभ और मोह के जाल में फँसकर इंसान यह मान बैठता है कि परिवार, धन और शरीर हमेशा साथ रहेंगे, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। जैसा कि शास्त्र और संत कहते हैं “अपना हरि बिनु और ना कोई”, अर्थात भगवान के सिवा इस संसार में कोई भी वास्तव में अपना नहीं है।
जब इंसान वासना का दास बन जाता है, तब वह सही-गलत का भेद खो देता है। दुनिया में ऐसे डरावने उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहाँ एक माँ ने अपने प्रेमी के मोह में आकर अपने ही मासूम बच्चों की हत्या कर दी।
एक घटना में महिला ने अपने प्रेमी को “कज़िन” बताकर घर में रखा। जब बच्चों ने उनके संबंध देख लिए, तो महिला और उसके प्रेमी ने बच्चों और घर की नौकरानी को ज़हर दे दिया और बच्चों को पहाड़ी से नीचे फेंक दिया। यह दिखाता है कि कुछ पलों की इंद्रिय-तृप्ति इंसान को कितना नीचे गिरा सकती है, जहाँ सबसे पवित्र रिश्ते भी बेमतलब हो जाते हैं।
आज ऐसे भी मामले देखने को मिलते हैं, जहाँ पत्नी और उसका प्रेमी मिलकर पति की हत्या की साजिश रचते हैं चाहे वह देश की सेवा करने वाला सैनिक ही क्यों न हो। माँ-बेटा हो या पति-पत्नी, रिश्तों से भरोसा इसलिए उठ रहा है क्योंकि लोग शास्त्रों की नहीं, इंद्रियों की सुन रहे हैं।
श्री प्रेमानंद जी महाराज एक सच्ची घटना बताते हैं। एक युवक साधना के मार्ग पर था, लेकिन विवाह के बाद उसकी पत्नी कहती थी कि वह उसके बिना मर जाएगी। गुरु ने उसे योग-विद्या सिखाकर कुछ समय के लिए प्राण रोक दिए, जिससे वह मृत प्रतीत हुआ। शोक के बीच गुरु ने कहा कि अगर कोई सच्चा प्रेमी “चरणामृत” पी ले, तो वह मर जाएगा लेकिन युवक जीवित हो जाएगा। जिस पत्नी ने कहा था “मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती”, उसने चरणामृत पीने से मना कर दिया और कहा “जो होना था हो गया, अब भगवान की जैसी इच्छा।”
ये भी पढ़े: एक शाप, एक भूल और कर्ण की हार: महाभारत का सबसे बड़ा भ्रम टूटा
यह संसार उपयोगिता तक साथ देता है। शरीर, धन और रिश्ते कोई भी मृत्यु के बाद साथ नहीं जाता। इसलिए महाराज समझाते हैं:
चाहे स्त्री हो या पुरुष, सच यही है हरि के सिवा कोई अपना नहीं। हर सांस अनमोल है, इसे व्यर्थ मत जाने दो। “राधा राधा” का जप और प्रभु को समर्पण ही वह आनंद देता है, जो यह संसार कभी नहीं दे सकता।






