
Draupadi (Source. Pinterest)
Misinterpretations of The Mahabharata: महाभारत और रामायण जैसे हमारे महान महाकाव्य सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि समाज, नैतिकता और मानव स्वभाव का आईना हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, भद्दे और तथ्यहीन टेलीविजन धारावाहिकों ने इन ग्रंथों की कई घटनाओं को गलत रूप में हमारे सामने परोस दिया। इसका सबसे बड़ा शिकार बनीं देवी द्रौपदी, जिन्हें महाभारत की सबसे गलत समझी जाने वाली महिला पात्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा। महाभारत से जुड़ी कई घटनाओं में सच्चाई और मिथक के बीच की रेखा धुंधली कर दी गई। खास तौर पर द्रौपदी से जुड़ी तीन घटनाएँ आज भी आम लोगों के बीच गलत ढंग से प्रचारित हैं।
मिथक: यह कहा जाता है कि देवी द्रौपदी ने कर्ण को स्वयंवर में अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह जातिवादी थीं।
सच्चाई: महाभारत के अनुसार, कर्ण स्वयं धनुष को प्रत्यंचा चढ़ाने में असफल रहे। यानी वे प्रतियोगिता में स्वयं हार गए। जब कर्ण और शल्य जैसे प्रसिद्ध क्षत्रिय धनुष नहीं उठा पाए, तो उपस्थित ब्राह्मणों को आश्चर्य हुआ कि एक साधारण ब्राह्मण कैसे सफल होगा। ऐसे में यह कहना कि द्रौपदी ने कर्ण को ठुकराया, तथ्यहीन है। जब कर्ण प्रतियोगिता में सफल ही नहीं हुए, तो अस्वीकार करने का सवाल ही कहाँ उठता है?
मिथक: लोकप्रिय धारावाहिकों में दिखाया गया कि दुर्योधन के तालाब में गिरते ही द्रौपदी हँस पड़ीं और उन्होंने धृतराष्ट्र का भी अपमान किया यहाँ तक कि प्रसिद्ध संवाद जोड़ा गया, “अंधे का पुत्र अंधा!”
सच्चाई: महाभारत में स्पष्ट वर्णन है कि जिस सभा में दुर्योधन गिरा, वहाँ द्रौपदी मौजूद ही नहीं थीं। दुर्योधन ने क्रिस्टल से बने फर्श को पानी समझ लिया और बाद में असली जलाशय को ज़मीन समझकर गिर पड़ा। इस पर सेवक, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव हँसे लेकिन द्रौपदी नहीं। टीवी के लिए जो संवाद जोड़े गए, वे मूल ग्रंथ का हिस्सा नहीं हैं।
मिथक: यह कहा जाता है कि द्रौपदी ने कुरु वंश को श्राप दिया और दुशासन के रक्त से बाल धोने की शपथ ली।
सच्चाई: महाभारत में ऐसा कोई श्राप या रक्त-स्नान की शपथ नहीं मिलती। द्युत सभा में अपमानित होने के बावजूद द्रौपदी ने उपस्थित वृद्धजनों को प्रणाम किया और धर्म का प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा, “मेरा एक कर्तव्य था, जिसे मैं पहले नहीं कर सकी…” उन्होंने सभा में अपने अपमान पर विलाप किया, बदले की घोषणा नहीं। उनका दर्द धर्म के पतन का था, न कि हिंसक प्रतिशोध का।
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देवी द्रौपदी को क्रोध, अहंकार और बदले की प्रतीक बनाकर पेश करना ऐतिहासिक और नैतिक दोनों ही दृष्टि से गलत है। महाभारत की मूल कथा पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि द्रौपदी साहस, मर्यादा और धर्म की आवाज़ थीं न कि टीवी सीरियल्स में दिखाई गई विवादित छवि।






