कर्ण-अर्जुन की दुश्मनी का रहस्य, क्या पिछले जन्म से तय थी महाभारत की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता?

Karna Arjun Past Birth: महाभारत में कर्ण और अर्जुन की शत्रुता केवल द्वापर युग की कहानी नहीं मानी जाती। पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, इन दोनों महान योद्धाओं का वैर पिछले जन्मों से चला आ रहा था।
Karna and Arjuna's enmity greatest rivalry of the Mahabharata predetermined by their past lives
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Karna Arjun Story: महाभारत में कर्ण और अर्जुन की शत्रुता केवल द्वापर युग की कहानी नहीं मानी जाती। पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, इन दोनों महान योद्धाओं का वैर पिछले जन्मों से चला आ रहा था। यही कारण है कि महाभारत का युद्ध केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि पूर्वजन्मों के अधूरे कर्मों का परिणाम भी था।

जब ब्रह्मा और महादेव के बीच हुआ युद्ध

पद्म पुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान महादेव के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में महादेव ने ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काट दिया। इस अपमान और क्रोध से ब्रह्मा जी के शरीर से पसीना निकला और उसी पसीने से एक अत्यंत शक्तिशाली योद्धा उत्पन्न हुआ। पसीने से जन्म लेने के कारण वह "स्वेदजा" कहलाया।

स्वेदजा बनाम रक्तजा: देवताओं का महासंग्राम

ब्रह्मा जी के आदेश पर स्वेदजा महादेव से युद्ध करने निकला। स्थिति गंभीर होती देख महादेव भगवान विष्णु के पास पहुँचे। तब भगवान विष्णु ने अपने ही रक्त से एक वीर योद्धा को जन्म दिया, जो "रक्तजा" कहलाया। स्वेदजा का जन्म 1000 कवचों के साथ हुआ था, जबकि रक्तजा के पास 1000 हाथ और 500 धनुष थे। दोनों के बीच भयानक युद्ध हुआ। स्वेदजा ने रक्तजा के 998 हाथ काट दिए और 499 धनुष तोड़ डाले, वहीं रक्तजा ने स्वेदजा के 999 कवच नष्ट कर दिए।

जीवनदान और भविष्य का वचन

जब रक्तजा हार के करीब था, तब भगवान विष्णु ने युद्ध रोक दिया। स्वेदजा ने दानवीरता दिखाते हुए रक्तजा को जीवनदान दिया। इसके बाद भगवान विष्णु ने स्वेदजा की जिम्मेदारी सूर्यनारायण को और रक्तजा की इंद्रदेव को सौंप दी। इंद्रदेव को यह वचन दिया गया कि अगले जन्म में रक्तजा अपने प्रतिद्वंद्वी स्वेदजा का वध करेगा।

द्वापर युग में जन्म: कर्ण और अर्जुन

यही स्वेदजा द्वापर युग में कर्ण बने और रक्तजा अर्जुन के रूप में जन्मे। महाभारत में अर्जुन द्वारा कर्ण का वध युद्ध के नियमों के विरुद्ध हुआ, जिसे इसी पूर्वजन्म के वचन से जोड़ा जाता है।

अर्जुन: नर-नारायण का अवतार

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, "वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।" यहाँ धनंजय अर्जुन का ही नाम है, जो यह दर्शाता है कि अर्जुन स्वयं नर रूप में नारायण के अंश थे।

अर्जुन के प्रसिद्ध नाम

अर्जुन को पार्थ, जिष्णु, किरीटिन, सव्यसाची, धनंजय, गाण्डीवधारी, कपिध्वज, गुडाकेश, बीभत्सु, कौन्तेय जैसे अनेक नामों से जाना जाता है, जो उनके अद्भुत व्यक्तित्व और पराक्रम को दर्शाते हैं।

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