

Secrets of Devotion: विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे, यह वाक्य केवल एक सांत्वना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जीवन का गहरा सत्य है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, जीवन की हर उलझन, हर टूटन और हर अशांति का समाधान पूर्ण शरणागति में छिपा है। जब साधक ईश्वर के चरणों में स्वयं को पूरी तरह अर्पित कर देता है, तब दिव्य कृपा स्वतः उसके जीवन में उतर आती है।
महाराज कहते हैं कि अधिकांश लोग ईश्वर को आधा-आधा समर्पण देते हैं कुछ बातें मानते हैं, कुछ अपनी शर्तों पर छोड़ देते हैं। जब व्यक्तिगत इच्छा बची रहती है, तब भक्ति अभिनय बन जाती है। इतिहास में पीपा जी महाराज जैसे संत हुए, जो गुरु के आदेश पर कुएं में कूदने तक को तैयार थे। सच्चे साधक के लिए गुरु और ईष्ट के अलावा कोई संबंध बड़ा नहीं होता। प्रह्लाद, विभीषण और भरत इसी कारण अमर हुए, क्योंकि उन्होंने ईश्वर को सांसारिक संबंधों से ऊपर रखा।
पूर्ण समर्पित भक्त सर्वधारता वाला बन जाता है वह स्वयं नीचे उतरकर पतितों को उठाता है। कभी-कभी संत की कृपा कठोर प्रतीत होती है, लेकिन वह आत्मा के कल्याण के लिए होती है। जैसे नारद जी का नलकूबर और मणिग्रीव को शाप देना, जो अंततः उन्हें श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन तक ले गया। ऐसे संत में सर्वाराध्यता भी होती है उनकी उपस्थिति मात्र से आसपास का वातावरण शांत हो जाता है।
संसार-सागर से पार होने के लिए पूर्ण विश्वास जरूरी है कि हर स्थिति में भगवान रक्षा करेंगे। इसके बाद आता है अनन्यता ऐसी निष्ठा कि साधक अपने उपास्य के विरुद्ध एक शब्द भी सहन न करे। सांसारिक रिश्ते कुछ दशकों के हैं, लेकिन ईश्वर से संबंध शाश्वत है।
महाराज स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति से पहले किसी को शिष्य नहीं बनाना चाहिए। गुरु अपने शिष्य के कर्मों का भार उठाता है। गलत मार्गदर्शन देने पर गुरु को भी दंड भोगना पड़ता है।
शरणागति की चरम अवस्था है निज स्वरूप सामर्थ्य विस्मरण। जब साधक अपने अस्तित्व तक को भूलकर ईश्वर में लीन हो जाता है। तब वह सूर्य में विलीन दीपक की तरह हो जाता है। इसीलिए कहा गया है विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे।