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बिना बहुमत के BJP ने बनाई थी सरकार, लेकिन विजय से मांग रहे ‘सबूत’, राज्यपाल का दोहरा मापदंड क्यों?
- Written By: अर्पित शुक्ला
Vijay Government Formation: तमिलनाडु में TVK प्रमुख विजय को शपथ दिलाने से पहले राज्यपाल ने बहुमत की शर्त रखी है। 2018 कर्नाटक मामले का हवाला देते हुए अब राजभवन के दोहरे मापदंड पर सवाल उठ रहे हैं।

विजय थलापति (डिजाइन फोटो)
Tamil Nadu Politics: सिनेमाई पर्दे से निकलकर तमिलनाडु की राजनीति के मैदान में उतरे तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के प्रमुख विजय के मुख्यमंत्री बनने की राह में राज्यपाल ने ‘स्पीड ब्रेकर’ लगा दिया है। कांग्रेस पार्टी के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने विजय राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मिलने लोक भवन पहुंचे थे, लेकिन उनको तुरंत शपथ दिलाने से साफ इनकार कर दिया गया।
राजभवन की ओर से एक सख्त शर्त रखी गई- पहले 118 विधायकों के समर्थन वाला पत्र लाइए, उसके बाद ही आगे की प्रक्रिया पूरी होगी। इस घटना के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर उस पुरानी और तीखी बहस को हवा दे दी है कि क्या देश में राज्यपाल राजनीतिक परिस्थितियों और पार्टियों के हिसाब से दोहरा मापदंड अपना सकते हैं?
अब इस सवाल की गहराई को नापने के लिए हम आपको ले चलते हैं 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में, जहां राजभवन की भूमिका बिल्कुल इसके उलट थी।
येदियुरप्पा को दी गई थी ‘छूट’
बता दें कि मई 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। 224 विधायकों वाली विधानसभा में भाजपा (BJP) 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन जादुई आंकड़े से बहुत दूर थी। दूसरी ओर, कांग्रेस और जेडीएस (JDS) ने मिलकर चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन कर लिया, जिसके बाद उनके पास बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा मौजूद था। कांग्रेस ने 80 और जेडीएस को 37 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन, तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में बी.एस. येदियुरप्पा को सरकार गठन का न्यौता दे दिया।
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कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा
राजभवन के दोहरे मापदंड पर उठ रहे सवाल
भाजपा नेता येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ भी ले ली। उनके शपथ से पहले 112 विधायकों की सूची नहीं मांगी गई, बल्कि उनको सदन में बहुमत साबित करने के लिए वक्त दिया गया। हालांकि, जब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फ्लोर टेस्ट का समय आया, तो बहुमत के अभाव में येदियुरप्पा को महज 3 दिन के भीतर इस्तीफा देना पड़ा और कांग्रेस-जेडीएस ने गठबंधन की सरकार बनाई। अब कर्नाटक और तमिलनाडु के इन दोनों मामलों को एक साथ रखकर देखा जाए तो कई विरोधाभास नजर आते हैं। इससे राज्यपालों की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शपथ से पहले मांग रहे सबूत
बता दें कि येदियुरप्पा के मामले में तत्कालीन राज्यपाल ने ये नहीं कहा था कि पहले बहुमत का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र लाओ, फिर शपथ दिलाऊंगा। कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल ने शपथ दिलाकर बहुमत साबित करने का समय दिया। वहीं, तमिलनाडु में विजय के मामले में राज्यपाल अर्लेकर राजभवन में ही 118 विधायकों के समर्थन की ‘फिजिकल गारंटी’ मांग रहे हैं।
थलपति विजय ने पेश किया सरकार बनाने का दावा, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
फ्लोर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
ऐसे मामले पर सुप्रीम कोर्ट बहुत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बहुमत का फैसला राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए। बता दें कि एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में देखा जाता है। 11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने अनुच्छेद 356 के तहत राज्य सरकारों की मनमानी बर्खास्तगी पर रोक लगाते हुए फैसला सुनाया था। इस फैसले में साफ तौर पर कहा गया था कि सरकार का बहुमत विधानसभा में ही साबित होना चाहिए। अब विजय के मामले में ऐसा लग रहा है जैसे तमिलनाडु के राज्यपाल फ्लोर टेस्ट से पहले ही राजभवन में टेस्ट लेना चाह रहे हैं।
गठबंधन की ताकत को नहीं मिली थी प्राथमिकता
बता दें कि जब 2018 में कांग्रेस-जेडीएस ने चुनाव के तुरंत बाद बहुमत का दावा पेश किया, तो उसको नजरअंदाज करते हुए सबसे बड़ी पार्टी (बिना बहुमत) को बुलाया गया। अब जब तमिलनाडु में विजय कांग्रेस पारिटी के समर्थन के साथ दावा पेश कर रहे हैं, तो नियमों की सख्ती अचानक से बढ़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स – सोशल मीडिया)
मालूम हो कि विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम को 2026 के विधानसभा चुनाव में 108 सीटें मिली और TVK ने सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया है। लेकिन 234 विधायकों वाले सदन में बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत है। कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन के बाद TVK का आंकड़ा 112-113 तक पहुंचा है, जो अभी भी बहुमत से छह कम है।
यह भी पढ़ें- सब एक जैसे हैं…थलापति विजय के कार्यकर्ता की नाबालिग से दुष्कर्म मामले में हुई गिरफ्तारी, सिंगर ने उठाया सवाल
क्या कहता है संविधान?
बता दें कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। इसके लिए परंपरा है कि सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को मौका मिले, इसके बाद फ्लोर टेस्ट हो। लेकिन ऐसे मामलों में संतुष्टि का पैमाना गवर्नर के विवेक पर ही निर्भर करता है, जिससे विवाद होता रहा है। कर्नाटक के येदियुरप्पा मामले में भी गवर्नर ने रिस्क लिया और वक्त दिया, जिससे भाजपा को फायदा हुआ। विजय के मामले में सुरक्षित खेल दिख रहा है कि पहले पूर्ण बहुमत का सबूत, फिर शपथ। कांग्रेस पार्टी इसको जनादेश की अवहेलना बता रही है।
Thalapathy vijay tvk tamil nadu governor floor test controversy karnataka 2018 comparison
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