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कारगिल युद्ध के ये 11 साहसी योद्धा, जिनके बलिदान पर आज भी भारत करता है गर्व
Kargil Vijay Diwas- कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जाने वाला है। यह दिन सन् 1999 के कारगिल युद्ध को समर्पित है। कारगिल युद्ध में जिन जांबाजों ने साहस का पराक्रम दिखाकर मुकाम हासिल किया था उनके नाम शायद ही लोग भूल गए है।
- Written By: दीपिका पाल
कारगिल युद्ध के असली हीरो (सौ.सोशल मीडिया)

देश के जांबाज वीरों को समर्पित दिन कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जाने वाला है। यह दिन सन् 1999 के कारगिल युद्ध को समर्पित है। कारगिल युद्ध में जिन जांबाजों ने साहस का पराक्रम दिखाकर मुकाम हासिल किया था उनके नाम शायद ही लोग भूल गए है पर इन जाबांजों की कहानियां आज हम याद करते है। कारगिल युद्ध में हमारे लिए लड़ने वाले सभी वीर हैं।

1. कैप्टन विक्रम बत्रा (परमवीर चक्र, मरणोपरांत) (13 जेएके राइफल्स)- कारगिल युद्ध की कहानी हर किसी की मुंह जुबानी है। वहीं पर पहले योद्धा विक्रम बत्रा का नाम सुनाई देता है। उनका जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। उन्हें कारगिल युद्ध का नायक माना जाता है और तोलोलिंग नाले के ऊपर स्थित चोटी 5140 पर पुनः कब्ज़ा करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जाबांज सैनिक बत्रा की बात याद करते हैं जिन्होंने कहा था, , "या तो मैं तिरंगा (भारतीय ध्वज) फहराकर आऊंगा, या उसमें लिपटा हुआ आऊंगा वापस आउंगा जरूर।
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2. ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव (परमवीर चक्र) (18 ग्रेनेडियर्स) - कारगिल युद्ध के दूसरे वीर योगेन्द्र सिंह यादव का नाम सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने के लिए जाना जाता है। वह घातक प्लाटून का भी हिस्सा थे और उन्हें टाइगर हिल पर लगभग 16500 फीट ऊँची खड़ी चट्टान पर स्थित तीन रणनीतिक बंकरों पर कब्ज़ा करने का काम सौंपा गया था। उनकी बटालियन ने 12 जून 1999 को तोलोलिंग टॉप पर कब्जा कर लिया और इस दौरान 2 अधिकारियों, 2 जूनियर कमीशन अधिकारियों और 21 सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

3. कैप्टन मनोज कुमार पांडे (परमवीर चक्र, मरणोपरांत) (1/11 गोरखा राइफल्स)- कारगिल युद्ध का दौर कहानी में हर कोई जानता है। इन जाबांज का नाम लिस्ट में शामिल है। वे 1/11 गोरखा राइफल्स के एक सैनिक थे जहां पर बताया जाता है कि, वे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र प्राप्त करने के एकमात्र उद्देश्य से भारतीय सेना में शामिल हुए थे। उन्हें मरणोपरांत इस परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

4. लेफ्टिनेंट बलवान सिंह (महावीर चक्र) (18 ग्रेनेडियर्स) - हरियाणा के रहने वाले इस जाबांज का नाम भी लिस्ट में शामिल है। लेफ्टिनेंट बलवान सिंह को 3 जुलाई 1999 को अपनी घातक प्लाटून के साथ एक बहुआयामी हमले के तहत उत्तर-पूर्व दिशा से टाइगर हिल की चोटी पर हमला करने का काम सौंपा गया था। भारी गोलाबारी के बीच, 12 घंटे से ज़्यादा समय तक तय किए गए स्पर तक पहुँचने के लिए अपनी टीम का नेतृत्व किया। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

5. मेजर राजेश सिंह अधिकारी (महावीर चक्र, मरणोपरांत) (18 ग्रेनेडियर्स)- इस लिस्ट में इन शूरवीर का नाम आता है जिन्होंने कारगिल युद्ध लड़ा। 30 मई 1999 को तोलोलोंग पर्वत पर कब्ज़ा करने के लिए, बटालियन के एक हिस्से के रूप में, उन्हें इसके अग्रिम मोर्चे पर कब्ज़ा करके, जहाँ दुश्मन की मज़बूत स्थिति थी, प्रारंभिक स्थिति सुरक्षित करने का काम सौंपा गया था। बताया जाता है कि, तोलोलिंग की दूसरी पोज़िशन पर कब्ज़ा कर लिया गया, जिसके बाद में पॉइंट 4590 पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन इस बीच इतनी चोटों के कारण वे जान बचाने में कामयाब नहीं रह पाएं। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो युद्ध के मैदान में बहादुरी के लिए दूसरा सर्वोच्च भारतीय सैन्य सम्मान है।

6. राइफलमैन संजय कुमार (परमवीर चक्र) (13 JAK Rif) - हिमाचल प्रदेश के रहने वाले इस योद्धा का नाम लिस्ट में शामिल है। 4 जुलाई 1999 को, उन्होंने मुश्कोह घाटी में पॉइंट 4875 के फ़्लैट टॉप क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के लिए तैनात हमलावर टुकड़ी के प्रमुख स्काउट बनने की पेशकश की। युद्ध के दौरान उन्होंने तीन घुसपैठियों को मार गिराया और खुद भी गंभीर रूप से घायल हो गए। वे दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में कामयाब रहें और भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

7. मेजर विवेक गुप्ता (महावीर चक्र, मरणोपरांत) (2 राजपूताना राइफल्स)- कारगिल युद्ध के यह हीरो देहरादून के रहने वाले है। 13 जून 1999 को, जब 2 राजपूताना राइफल्स ने द्रास सेक्टर में तोलोलिंग टॉप पर बटालियन हमला किया, तब वह अग्रणी चार्ली कंपनी की कमान संभाल रहे थे। युद्ध के दौरान दुश्मन की प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया करते हुए उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया की और दुश्मन के ठिकाने पर रॉकेट लांचर दाग दिया। इससे पहले कि हैरान दुश्मन संभल पाता, उन्होंने दुश्मन के ठिकाने पर हमला कर दिया। और इसलिए उस समय उन्हें दो गोलियां लगीं, इसके बावजूद वे ठिकाने की ओर बढ़ते रहे।उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

8. कैप्टन एन केंगुरुसे (महावीर चक्र, मरणोपरांत) (एएससी, 2 राज आरआईएफ)- कारगिल युद्ध के इस जाबांज का नाता नागालैंड से है। बताया जाता है कि, 28 जून 1999 की रात को ऑपरेशन विजय के दौरान, वह द्रास सेक्टर में एरिया ब्लैक रॉक पर हमले के दौरान घातक प्लाटून कमांडर थे।उन्होंने एक चट्टान पर स्थित दुश्मन की मशीन गन की एक अच्छी तरह से तैनात स्थिति पर हमला करने के साहसिक कमांडो मिशन की ज़िम्मेदारी ली, दुश्मनों से लड़ते हुए इस हीरो ने वीरगति को प्राप्त किया। उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

9. लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफ़ोर्ड नोंग्रम (महावीर चक्र, मरणोपरांत) (12 JAK LI)- कारगिल युद्ध में मेघालय के रहने वाले इस जाबांज का नाम सामने आता है। बटालिक सेक्टर में पॉइंट 4812 पर कब्ज़ा करने के अभियान में, उन्हें दक्षिण-पूर्वी दिशा की एक पहाड़ी पर हमला करने का काम सौंपा गया था। दुश्मनों से लड़ते हुए उन्होंने गोली खा ली। प्वाइंट 4812 पर अंततः कब्ज़ा करने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

10. नायक दिगेंद्र कुमार (महावीर चक्र) (2 RAJ RIF) - कारगिल युद्ध में राजस्थान के इस योद्धा का नाम सामने आता है। जब आक्रमण समूह 13 जून 1999 को अपने उद्देश्य के करीब था, तो यह सार्वभौमिक मशीन गन, भारी बंदूक और अन्य छोटे हथियारों के साथ प्रभावी आग के तहत आया, जिससे आक्रमण समूह में भारी हताहत हुए। उन्हें अपनी बाईं बांह में गोली लगी थी।उन्हें 1999 (स्वतंत्रता दिवस) में भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

11. कैप्टन अमोल कालिया (वीर चक्र) (12 JAK LI)- कारगिल युद्ध के हीरो का नाम शायद लोग जानते होंगे लेकिन उन्होंने कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान, कैप्टन कालिया की टीम को पाकिस्तानी सैनिकों से एक बेहद महत्वपूर्ण पर्वत शिखर वापस लेने के लिए भेजा गया था। यह एक खतरनाक मिशन था, लेकिन कैप्टन कालिया और उनके 13 साथी पर्वतीय युद्ध में माहिर थे।कैप्टन कालिया और उनकी टीम ने पहाड़ की चोटी वापस जीत ली, लेकिन इसकी उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें और उनके साथियों को युद्ध के सबसे बहादुर सैनिकों में से एक के रूप में याद किया जाता है।
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