

Dhar Bhojshala High Court: धार भोजशाला मामले में मंगलवार, 12 मई को हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस प्रकरण में 6 अप्रैल से लगातार सुनवाई चल रही थी। मामले की सुनवाई जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने की।
सुनवाई के दौरान शासन पक्ष की ओर से एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने पक्ष रखा। वहीं हिंदू पक्ष की ओर से मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन, अधिवक्ता विनय जोशी और पार्थ यादव ने किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं एडिशनल सालिसिटर जनरल सुनील जैन उपस्थित रहे। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, अजहर वारसी और नूर अहमद ने अदालत में अपना पक्ष रखा। वहीं एक अन्य याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन उपस्थित रहीं। इसके अलावा अलग याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता एके चितले और कार्तिक चितले ने पैरवी की।
वर्ष 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका क्रमांक 10497/2022 में धार भोजशाला के धार्मिक स्वरूप का निर्धारण करते हुए हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार दिए जाने की मांग की गई थी। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वे कराने के निर्देश दिए, जिसके तहत भोजशाला परिसर में लगातार 98 दिनों तक सर्वे कार्य किया गया।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां से हाई कोर्ट को निर्धारित समय सीमा में सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ लिंक कर संयुक्त रूप से सुनवाई की गई मामले में जैन समाज की ओर से भी याचिका दायर कर दावा किया गया कि धार भोजशाला मूल रूप से जैन मंदिर है। वहीं मुस्लिम पक्ष लगातार इसे मस्जिद बताते हुए अपना दावा पेश कर रहा है।
हिंदू पक्ष की मांग है कि धार भोजशाला में अनुच्छेद 25 के तहत हिंदू समाज को प्रतिदिन पूजा का अधिकार दिया जाए और मुस्लिम पक्ष की नमाज पर रोक लगे। साथ ही भोजशाला के संचालन के लिए ट्रस्ट बनाने, एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को निरस्त करने और ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाकर भोजशाला में स्थापित करने की मांग भी की गई है।
मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि धार भोजशाला एक मस्जिद है और वर्ष 1935 से वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है। पक्षकारों ने अदालत में कहा कि यदि यह मंदिर होता तो मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के प्रमाण मौजूद होते, जबकि ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं।
उनका कहना है कि स्थल के धार्मिक स्वरूप का निर्धारण करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है और यह मामला जिला अदालत में सुना जाना चाहिए। मुस्लिम पक्ष ने वैज्ञानिक सर्वे पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें कार्बन डेटिंग का उपयोग नहीं किया गया, इसलिए निर्माण को परमारकालीन बताना सही नहीं है। साथ ही कथित वाग्देवी प्रतिमा के भोजशाला परिसर से मिलने के दावे को भी गलत बताया गया।