
नहीं रहे 'अरण्यऋषि' , प्रकृति के उपासक को अंतिम विदाई। (सौजन्यः सोशल मीडिया)
सोलापुर: भारत के जाने-माने पर्यावरणविद, लेखक और वन अधिकारी मारुति भुजंगराव चितमपल्ली का बुधवार की शाम निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। गुरुवार को उन्हें सोलापुर–तुलजापुर मार्ग स्थित हिंदू लिंगायत श्मशान भूमि में सरकारी सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। उनके सम्मान में पुलिस दस्ते ने बंदूकों से हवाई फायर कर सलामी दी और बड़ी संख्या में अधिकारी, जनप्रतिनिधि तथा पर्यावरण प्रेमी श्रद्धांजलि देने पहुंचे। पूरे वातावरण में एक गहरी शोक की लहर व्याप्त थी।
मारुति चितमपल्ली ने अपने जीवन के 36 वर्ष महाराष्ट्र के वन विभाग में सेवा करते हुए बिताए। वे नवेगांव बांध, नागझिरा और मेळघाट जैसे प्रमुख अभयारण्यों में कार्यरत रहे। सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने पूरी तरह से साहित्य, पक्षी विज्ञान और प्रकृति शिक्षा को समर्पित कर दिया। वे 25 से अधिक पुस्तकों के लेखक थे। उनकी चर्चित रचनाओं में ‘जंगल की राहें’, ‘पक्षी ज्ञान’, ‘घोंसले के पार’, ‘मानव और वन’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं। उन्होंने आम जनता को प्रकृति के करीब लाने का कार्य किया और पक्षियों की भाषा को सरल शब्दों में समझाया।
30 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। दिल्ली से लौटने के बाद से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही और 18 जून की शाम सोलापुर स्थित उनके निवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर प्रधानमंत्री कार्यालय सहित देशभर की विभिन्न हस्तियों ने शोक व्यक्त किया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, अजित पवार समेत अनेक नेताओं, लेखकों और सामाजिक संगठनों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
गुरुवार को उनकी अंतिम यात्रा सोलापुर के विभिन्न मार्गों से निकाली गई। श्रद्धांजलि देने वालों में जिलाधिकारी कुमार आशीर्वाद, नगर निगम आयुक्त डॉ. सचिन ओंबासे, पुलिस आयुक्त एम. राजकुमार, विधायक सचिन कल्याणशेट्टी, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुलदीप जंगम और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अतुल कुलकर्णी समेत अनेक गणमान्य लोग शामिल हुए।
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चितमपल्ली सिर्फ एक लेखक नहीं थे, वे प्रकृति के उपासक थे। उन्होंने लोगों को यह समझाया कि जंगल केवल लकड़ी या जानवरों का स्रोत नहीं, बल्कि मनुष्यता की एक जीवनरेखा हैं। उन्होंने स्कूलों और ग्रामसभाओं में व्याख्यान दिए, छात्रों को प्रकृति के महत्व की जानकारी दी और साहित्य के माध्यम से जागरूकता फैलाई।
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उनका जाना एक युग के अंत जैसा है। वे न केवल महाराष्ट्र, बल्कि पूरे भारत के लिए पर्यावरण चेतना के प्रतीक बन चुके थे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल लोग कह रहे थे, “जंगलों का सच्चा मित्र चला गया, लेकिन उसकी प्रेरणा हमेशा जीवित रहेगी।” उनकी लेखनी और दृष्टि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक धरोहर बन चुकी है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता। “अब वे नहीं हैं, लेकिन हर पंछी की उड़ान और हर जंगल की हरियाली में उनकी आत्मा बसती रहेगी।”






