
युवक को डोली में ले जाते परिजन (सोर्स: सोशल मीडिया)
Palghar Tribal Death News: आजादी के दशकों बाद भी महाराष्ट्र के कई ग्रामीण और आदिवासी इलाके बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच एक दिल दहला देने वाली घटना पालघर जिले के जव्हार तालुका से सामने आई है। यहां तिलोंडा (आंबेपाड़ा) गांव में रहने वाले 18 वर्षीय शैलेश मगन वागदड़ा की समय पर इलाज न मिलने के कारण मृत्यु हो गई।
जानकारी के अनुसार, शैलेश पिछले कुछ दिनों से गंभीर रूप से बीमार था। मंगलवार (4 फरवरी) की सुबह उसकी तबीयत अचानक और बिगड़ गई। उसे तत्काल अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी, लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। करीब 4 किलोमीटर तक ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी रास्ता होने के कारण एम्बुलेंस का गांव में आना असंभव था।
मजबूरी में, परिजनों और ग्रामीणों ने लकड़ी और कपड़ों की मदद से एक अस्थायी ‘डोली’ (पालकी) बनाई और शैलेश को कंधे पर लादकर पथरीले रास्तों से पैदल ही मुख्य सड़क की ओर चल पड़े। पहाड़ियों को पार कर जब तक उसे स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पालघर जिले का तिलोंडा गांव एक आदिवासी बहुल इलाका है, जहां आज भी सड़क, बिजली और स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक सुविधाओं का अकाल है। ग्रामीणों का कहना है कि मानसून के दौरान स्थिति और भी बदतर हो जाती है। भारी बारिश में गांव पूरी तरह से कट जाता है। यदि कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे अस्पताल पहुंचाना मौत से लड़ने जैसा होता है।
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इस घटना के बाद से पूरे इलाके में प्रशासन के खिलाफ गहरा गुस्सा है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उन्होंने सड़क निर्माण के लिए ग्रामसेवक, सरपंच और संबंधित सरकारी विभागों को कई बार आवेदन दिए, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि क्या सरकार और प्रशासन तभी जागेगा जब ऐसी और जानें चली जाएंगी?
पालघर की यह घटना कोई पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी कई बार गर्भवती महिलाओं और मरीजों को अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही दम तोड़ते देखा गया है। डिजिटल इंडिया और विकसित महाराष्ट्र की बातों के बीच ‘डोली’ पर दम तोड़ती ये जिंदगियां प्रशासन की विफलता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती हैं।






