Nagpur University में ब्लेमिंग गेम शुरू! एजेंसी की नाकामी का ठीकरा अधिकारियों पर फोड़ा, कैंपस में फैला असंतोष

RTM Nagpur University: नागपुर विश्वविद्यालय में प्रशासनिक भूकंप! वरिष्ठ को हटाकर कनिष्ठ को परीक्षा विभाग की कमान। एजेंसी पर कार्रवाई के बजाय अधिकारियों पर गिरी गाज। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
RTMNU Vice-Chancellor's decision to replace senior officials with junior staff in the exam department sparks outrage. Students face delays as agency failure continues.
नागपुर यूनिवर्सिटी (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Nagpur University: नागपुर विश्वविद्यालय में लंबे समय से लंबित परिणामों को तेजी से घोषित करने के प्रयास में उपकुलपति द्वारा परीक्षा विभाग में बड़ा फेरबदल किया गया। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में जिस कंपनी पर कार्य में विफल रहने के आरोप हैं, उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन प्रयासों के बाद भी ग्रीष्म सत्र की परीक्षाओं में सुधार की उम्मीद नजर नहीं आ रही है।

उपकुलपति ने परीक्षा विभाग में वरिष्ठ उप कुलसचिव (डिप्टी रजिस्ट्रार) को हटाकर सबसे कनिष्ठ अधिकारी को प्रभारी परीक्षा संचालक पद पर नियुक्त कर दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया, जब परीक्षा प्रणाली में लगातार तकनीकी और प्रशासनिक समस्याएं सामने आ रही हैं। विश्वविद्यालय के भीतर इस फैसले को लेकर असंतोष का माहौल है।

कई अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस तरह का निर्णय एक गलत प्रथा शुरू करने का संकेत है। उनका कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया में आ रहीं समस्याएं मुख्य रूप से उस कंपनी की अक्षमता से जुड़ी हैं, जिसे यह कार्य सौंपा गया है। ऐसे में कंपनी पर कार्रवाई करने के बजाय नागपुर विश्वविद्यालय के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।

अधिकारियों का यह भी कहना है कि यदि ग्रीष्म सत्र में भी कंपनी इसी तरह विफल रहती है, तो फिर यही मापदंड सभी पर लागू होने चाहिए। चाहे वह अधिकारी हों या स्वयं उपकुलपति। यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि जिम्मेदारी तय करनी है, तो उसे समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

ठोस और सही दिशा में कदम उठाने की जरूरत

गौरतलब है कि उपकुलपति के कार्यभार संभालने के पिछले 5 महीनों में विश्वविद्यालय एक भी परीक्षा सत्र को सुचारु रूप से संचालित नहीं कर सका है। लगातार देरी, तकनीकी गड़बड़ियां और प्रशासनिक अस्थिरता के कारण पूरी परीक्षा प्रणाली प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन निर्णयों का सीधा असर छात्रों पर पड़ रहा है।

परिणामों में देरी, परीक्षा प्रक्रिया में अव्यवस्था और बार-बार हो रहे बदलावों ने छात्रों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। सूत्रों के अनुसार स्थिति को अभी भी नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए ठोस और सही दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।

इसके विपरीत उपकुलपति द्वारा कंपनी को केवल एक औपचारिक नोटिस भेजा गया है, जबकि अपेक्षा थी कि उसकी कार्यप्रणाली की गंभीर समीक्षा कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल विश्वविद्यालय में प्रशासनिक फैसलों को लेकर असमंजस और असंतोष का माहौल है और सबसे अधिक प्रभावित वे छात्र हैं, जो समय पर परिणाम और सुचारु परीक्षा प्रणाली की उम्मीद कर रहे हैं।

आरोपों से बचने बदलाव की नीति

वरिष्ठ अधिकारी को हटाकर कनिष्ठ अधिकारी को नियुक्त करना कितना तर्कसंगत है क्योंकि परीक्षा लेना और परिणाम घोषित करना सामूहिक जिम्मेदारी है। उपकुलपति खुद को आरोपों से बचाने के लिए इस तरह का बदलाव कर रही हैं। पिछले महीनों से विवि में प्र-उपकुलपति नहीं है। अधिष्ठाताओं का परीक्षाओं पर ध्यान नहीं है। इस हालत में व्यवस्था में कैसे सुधार होगा? छात्रों के हित में ठोस निर्णय लेने की जरूरत है। समूची व्यवस्था गड़बड़ा गई है। - डॉ. बबनराव तायवाडे, वरिष्ठ प्राधिकरण सदस्य

विवि में ‘ब्लेमिंग गेम’ चल रहा

इन दिनों विवि में ‘ब्लेमिंग गेम’ चल रहा है। विवि छात्रों के लिए बना है। छात्र हित में निर्णय लिये जाने चाहिए। वरिष्ठता का नियम सभी के लिए लागू है। फिर विवि प्रशासन इसे कैसे नजरअंदाज कर सकता है। यह तो सरासर गलत है। परीक्षा के लिए एजेंसी के चयन के वक्त ही योग्य निर्णय लिया जाना चाहिए था। अब विवि की गलती की सजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। एक बार वक्त निकल गया तो वापस नहीं आता। एनईपी लागू करने में विवि राज्य में अव्वल रहा, लेकिन अब परीक्षा और परिणाम में पीछे हो गया है। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

- डॉ. स्मिता वंजारी, सीनेट सदस्य

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