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47 साल पुराने संपत्ति विवाद, नागपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, दत्तक पुत्र का पैतृक संपत्ति पर हक बरकरार
Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने अहम फैसले में दत्तक पुत्र के पैतृक संपत्ति पर अधिकार को बरकरार रखा। 1979 से चल रहे विवाद में कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज कर दी।
- Written By: अंकिता पटेल

नागपुर हाई कोर्ट, दत्तक पुत्र अधिकार,(सोर्स: नवभारत फाईल फोटो)
Nagpur Adopted Son Rights High Court Case: नागपुर हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद के एक बेहद पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दत्तक पुत्र (गोद लिए हुए बेटे) के पैतृक संपत्ति पर अधिकार को बरकरार रखा न्यायमूर्ति रोहित डब्ल्यू, जोशी ने अपने फैसले में 1979 से चले आ रहे इस मुकदमे का निपटारा करते हुए प्रतिवादियों (श्यामसुंदर खंडेलवाल के कानूनी उत्तराधिकारियों) की द्वितीय अपील को खारिज कर दिया। मूल संपत्ति रामदयाल अग्रवाल की थी, जो बीड़ी निर्माण के पैतृक व्यवसाय से जुड़े थे।
श्यामसुंदर खंडेलवाल शुरुआत में रामदयाल के मुनीम (अकाउंटेंट) थे और बाद में दुकान में वर्किंग पार्टनर बन गए। 15 अप्रैल 1968 को रामदयाल ने मकान नंबर 258 का एक ‘गिफ्ट डीड’ (दान पत्र) श्यामसुंदर के नाम कर दिया, जिसमें यह शर्त थी कि श्यामसुंदर 4 साल के भीतर मकान नंबर 261 खाली कर देंगे। रामदयाल की मृत्यु के बाद उनके दत्तक पुत्र चंद्रप्रकाश और विधवा पत्नी लक्ष्मीचाई ने 1979 में इस गिफ्ट डीड को चुनौती देते हुए मुकदमा दायर किया। उनका तर्क था कि यह संपत्ति पैतृक है और पिता द्वारा बिना किसी ‘कानूनी आवश्यकता’ के इसे दान नहीं किया जा सकता।
क्या चंद्रप्रकाश वैध दत्तक पुत्र हैं?
प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि चंद्रप्रकाश कानूनी रूप से रामदयाल के बेटे नहीं हैं लेकिन हाई कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर माना कि चंद्रप्रकाश को 9 दिसंबर 1953 को उनके जैविक माता पिता द्वारा रामदयाल को गोद दिया गया था। अदालत ने पाया कि गोद लेने की प्रक्रिया में ‘दत्त होमम’ जैसी सभी जरूरी रस्में निभाई गई थीं और बचपन से ही रामदयाल ने चंद्रप्रकाश को अपने बेटे के रूप में ही समाज में मान्यता दी थी। इसके अलावा 1971 में रामदयाल ने एक रजिस्टर्ड ‘दत्तक ग्रहण घोषणा पत्र भी बनवाया था।
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सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए ‘स्टे’ की मांग खारिज
निचली अदालत (2003) और प्रथम अपीलीय अदालत (2007) के फैसलों को सही ठहराते हुए हाई कोर्ट ने वादी (चंद्रप्रकाश अग्रवाल) के पक्ष में डिक्री को बरकरार रखा, फैसले के तुरंत बाद अपीलकर्ताओं (खखंडेलवाल परिवार) ने सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए 10 सप्ताह के स्टे’ (रोक) की मांग की कितु हाई कोर्ट ने इस मांग को यह कहते हुए सख्ती से खारिज कर दिया कि यह मुकदमा 1979 से लंबित है (करीब 47 साल) और वादी को 2003 में ही डिक्री मिल गई थी। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय के बाद अब मूल वादी की न्याय के फल से वंचित नहीं रखा जा सकता।
पैतृक संपत्ति या फर्म की संपत्ति ?
बचाव पक्ष का कहना था कि संपत्ति पार्टनरशिप फर्म की है लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि जब रामदयाल ने इन संपत्तियों (मकान नंबर 258 और 261) को 1931 और 1926 में खरीदा था, तब उनकी उम्र मात्र 13 और 18 वर्ष थी। इतनी कम उम्र में कोई स्वतंत्र आय न होने के कारण यह साचित होता है कि संपत्तियां पुश्तैनी व्यवसाय के फंड से खरीदी गई थीं।
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इसलिए यह पूरी तरह से एक पैतृक संपत्ति मानी जाएगी। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि 1968 के गिफ्ट डीड को 1979 में चुनौती देना ‘लिमिटेशन एक्ट’ के बाहर है क्योंकि इसके लिए 3 साल का समय होता है लेकिन हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह ‘पैतृक संपत्ति’ का मामला है, इसलिए परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 109 के तहत संपत्ति पर कब्जे को चुनौती देने की समय सीमा 3 वर्ष नहीं बल्कि 12 वर्ष होती है। 1968 के गिफ्ट डीड के खिलाफ 1979 में किया गया दावा पूरी तरह से वैध समय सीमा के भीतर है।
High court adopted son ancestral property right verdict nagpur
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