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मराठी का सम्मान करें, पर सख्ती न करें, संजय निरुपम ने अपनी ही सरकार के मराठी टेस्ट पर उठाए सवाल
Mumbai Auto Taxi Marathi Rule: शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। उन्होंने कहा कि भाषा डर से नहीं, प्यार से बढ़ती है।
- Written By: गोरक्ष पोफली

संजय निरुपम (सोर्स: सोशल मीडिया)
Sanjay Nirupam Marathi Language Statement: महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य बनाने (Mumbai Auto Taxi Marathi Rule) के राज्य सरकार के फैसले पर शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के भीतर से ही अलग स्वर सुनाई देने लगे हैं। पार्टी के प्रवक्ता संजय निरुपम ने इस संबंध में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को पत्र लिखकर अपनी चिंता व्यक्त की है। निरुपम ने स्पष्ट किया कि मराठी भाषा का सम्मान होना ही चाहिए, लेकिन इसे लागू करने के लिए ‘सख्ती’ या ‘डर’ का माहौल पैदा करना ठीक नहीं है।
मराठी अस्मिता और व्यक्तिगत विचार
संजय निरुपम ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सबसे पहले, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ और मैंने अपने पत्र में भी लिखा है कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा का सम्मान होना चाहिए। राज्य सरकार का यह अनुरोध कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी भाषा का सम्मान करना चाहिए, उसे बोलना और समझना चाहिए, बिल्कुल सही है। यह सरकार की स्थिति है, पार्टी की स्थिति है और मेरा व्यक्तिगत विचार भी यही है। निरुपम ने जोर देकर कहा कि जो लोग महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमाते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा का ज्ञान होना एक अच्छी बात है और इससे यात्रियों के साथ संवाद में आसानी होती है।
Mumbai, Maharashtra: Shiv Sena spokesperson Sanjay Nirupam says, “First of all, I would like to make it clear and I have also written this in my letter that the Marathi language should be respected in Maharashtra. It is the request of the state government that everyone living in… pic.twitter.com/L0nKYh3WS4 — IANS (@ians_india) April 24, 2026
सख्ती से बढ़ेगी असुरक्षा
हालांकि, संजय निरुपम ने 1 मई से लागू होने वाले कड़े नियमों और लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी पर आपत्ति जताई है। उन्होंने अपने पत्र में उल्लेख किया कि मुंबई और महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में गुजरात, उत्तर भारत, पंजाब और दक्षिण भारतीय राज्यों से आए हजारों चालक वर्षों से सेवा दे रहे हैं। निरुपम का मानना है कि अचानक भाषा का कड़ा ‘टेस्ट’ लेना और लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई से गरीब चालकों की आजीविका पर संकट आ सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि “एक भाषा स्वीकार्यता (Acceptance) के माध्यम से बढ़ती है, न कि प्रवर्तन (Enforcement) के माध्यम से।
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सख्ती के कारण चालकों के बीच डर और असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है, जो शहर की परिवहन व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। निरुपम ने सुझाव दिया है कि चालकों से बहुत शुद्ध मराठी की अपेक्षा करने के बजाय ‘कामचलाऊ’ मराठी ज्ञान को आधार बनाया जाना चाहिए ताकि यात्रियों के साथ वे बुनियादी संवाद कर सकें।
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राजनीतिक घमासान और विरोध
गौरतलब है कि परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने हाल ही में घोषणा की थी कि 1 मई (महाराष्ट्र दिवस) से सभी लाइसेंस प्राप्त चालकों के लिए मराठी पढ़ना, लिखना और बोलना अनिवार्य होगा। नियमों का पालन न करने वालों के लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं। इस फैसले का जहाँ राज ठाकरे की मनसे और उद्धव गुट ने समर्थन किया है, वहीं संजय निरुपम जैसे नेताओं ने मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। 4 मई को कुछ श्रमिक संगठनों ने इस निर्णय के खिलाफ मोर्चा निकालने की भी चेतावनी दी है।
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