
शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे (सोर्स: सोशल मीडिया)
Shiv Sena Symbol Case: मुंबई में मेयर पद पर चल रहे विवाद के बीच 21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव चिह्न विवाद से जुड़ी याचिकाओं की अंतिम सुनवाई होगी। जानकारों का कहना है कि अगर शीर्ष अदालत ने अपना फैसला शिंदे गुट के खिलाफ सुनाया तो सारा गेम पलट सकता है।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए उन्हें धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित किया गया। ऐसे में महाराष्ट्र समेत पूरे देश की नजर 21 जनवरी को होने वाली सुनवाई पर टिकी है।
जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में बड़ी राजनीतिक टूट देखने को मिली। पार्टी के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने कई विधायकों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से बगावत की थी। इस विद्रोह के चलते शिवसेना दो धड़ों में बंट गई। इसके बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले दल को शिवसेना का नाम व चुनाव चिह्न आवंटित किया गया। वहीं उद्धव ठाकरे वाले गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का नाम मशाल चुनाव चिह्न दिया गया।
इसी बीच भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शर्त मानने से इनकार कर दिया है, जिससे बीएमसी के अगले मेयर को लेकर भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना के बीच तनातनी बढ़ने के आसार हैं। शिंदे ने मेयर पद को ढाई-ढाई साल के लिए बांटने का प्रस्ताव रखा था, जिसमें पहले ढाई साल भाजपा और बाद के ढाई साल उनकी शिवसेना को यह पद देने की बात थी, लेकिन भाजपा ने इस फॉर्मूले को स्वीकार नहीं किया।
यह भी पढ़ें:- अगर ऐसा हुआ तो उद्धव ठाकरे गुट से बनेगा मुंबई का मेयर! जानें BMC का दिलचस्प समीकरण
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से यह संदेश जाएगा कि महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में भाजपा शिंदे गुट पर निर्भर है। इसके अलावा, मुंबई की सबसे बड़ी और मजबूत पार्टी होने के बावजूद शिंदे के बिना भाजपा कमजोर है, ऐसा संकेत भी जनता तक जा सकता है, जिससे पार्टी को लेकर असमंजस की स्थिति बन सकती है। इन्हीं कारणों से केंद्रीय नेतृत्व ने शिंदे की शर्त को खारिज कर दिया।
भाजपा नेतृत्व ने शिंदे को यह भी स्पष्ट संकेत दिया है कि बीएमसी के नए मेयर के नाम का फैसला राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सहमति से ही होगा। पार्टी का तर्क है कि बीएमसी चुनाव पूरी तरह फडणवीस की रणनीति और नेतृत्व में लड़ा गया था, इसलिए उनकी राय को नजरअंदाज करना गलत संदेश देगा। ऐसा होने पर कार्यकर्ताओं में निराशा फैलने का खतरा है, जिससे भाजपा हर हाल में बचना चाहती है।






