BMC चुनावों में शिवसेना यूबीटी की क्यों हुई दुर्गति? शर्मनाक हार की 6 बड़ी वजह

BMC Results: पिछले 30 वषोंं से BMC पर ठाकरे परिवार का राज चल रहा था। जिस तरह के रूझान आ रहे हैं वो साफ बता रहे हैं कि उद्धव ठाकरे मुंबई की जनता की नब्ज पहचानने में बुरी तरह फेल साबित हुए हैं।
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राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे
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BMC Election Results: महायुति (बीजेपी-एकनाथ शिंदे शिवसेना) को बीएमसी में भारी बहुमत मिलता नजर आ रहा है। सबसे ज्यादा नुकसान शिवसेना यूबीटी को होता दिख रहा है। राज ठाकरे को साथ लेकर चुनाव लड़ने का फैसला भी उद्धव ठाकरे के लिए फायदेमंद साबित नहीं होता दिख रहा। यही रुझान महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव नतीजों में भी दिखाई दे रहा है। बीजेपी की स्थिति यहां भी लगातार मजबूत होती जा रही है।

प्रदेश की 29 नगर निगमों में बीजेपी जबरदस्त पकड़ बनाती नजर आ रही है, जबकि केंद्र और राज्य सरकार में उसकी सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिवसेना भी अपने प्रभाव वाले इलाकों में जीत दर्ज करती जा रही है। कुल 2869 वार्डों में से 1553 के रुझान सामने आ चुके हैं, जिनमें बीजेपी करीब आधे वार्डों पर बढ़त बनाए हुए है। यदि शिवसेना को भी जोड़ लिया जाए तो महायुति औसतन दो-तिहाई से अधिक वार्डों पर काबिज हो सकती है। कुल मिलाकर, शहरी निकाय चुनावों के नतीजे भी विधानसभा चुनावों की ही दिशा में जाते दिख रहे हैं। वहीं ‘मराठी मानुस’ को लेकर ठाकरे बंधुओं का शोर मतदाताओं में कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।

हार को 6 बड़े कारण

1- मराठी वोटों का बंटवारा और कमजोर ‘मराठी प्राइड’ अभियान

ठाकरे बंधुओं ने ‘मराठी मानुस’ के मुद्दे पर जोर दिया। एक्सिस माय इंडिया के मुताबिक मराठी मतदाताओं में उन्हें 49% वोट शेयर मिला। लेकिन मुंबई में मराठी वोटर कुल 38% ही हैं, जबकि उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदाय (30–35%) बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ रहे। महायुति ने गैर-मराठी वोटों को बेहतर ढंग से जोड़ा। ठाकरे गठबंधन का फोकस केवल मराठी वोटों तक सीमित रहा, जो नाकाफी साबित हुआ। गैर-मराठी भाषियों को मराठी बोलने के लिए मजबूर करने की घटनाओं से न सिर्फ उत्तर और दक्षिण भारतीय बल्कि कई मराठी मतदाता भी नाराज हुए।

2- कांग्रेस की जगह राज ठाकरे से गठबंधन, रणनीतिक चूक

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे उद्धव ठाकरे की “बड़ी भूल” बताया है। राज ठाकरे की मनसे पहले से ही कमजोर स्थिति में थी और उनके साथ जाने से उद्धव को खास लाभ नहीं मिला। मनसे का उत्तर भारतीय विरोधी इतिहास भी नुकसानदेह साबित हुआ। इसके चलते मुंबई के उत्तर भारतीय मतदाता ठाकरे गठबंधन से दूर होकर बीजेपी–शिंदे गुट की ओर चले गए। कांग्रेस के बजाय मनसे को चुनने से अल्पसंख्यक वोट भी हाथ से निकल गए।

3- ‘ठाकरे ब्रांड’ की चमक फीकी पड़ना

2022 में शिवसेना विभाजन के बाद ठाकरे परिवार का राजनीतिक असर कमजोर हुआ। चुनाव आयोग ने भी शिवसेना यूबीटी को ‘असली शिवसेना’ नहीं माना। आम धारणा बन गई कि ठाकरे परिवार का आम जनता से सीधा जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा। युवा मतदाताओं में भी ‘ठाकरे’ नाम की अपील घटती दिखी, जबकि 18–25 आयु वर्ग में बीजेपी को मजबूत समर्थन मिला।

4- महायुति की मजबूत संगठनात्मक पकड़

बीजेपी और शिंदे शिवसेना ने संगठन स्तर पर बेहतर प्रदर्शन किया। विकास कार्यों और केंद्र की योजनाओं को मुद्दा बनाकर महायुति ने भरोसा जीता। अनुमान के मुताबिक महायुति का वोट शेयर 42–45% तक पहुंच सकता है, जबकि ठाकरे गठबंधन 32–37% के बीच सिमटता दिख रहा है।

5- राज ठाकरे की बदलती राजनीति

राज ठाकरे का कभी मराठी, कभी हिंदुत्व और कभी बीजेपी के करीब जाने वाला रुख मतदाताओं में स्थायी भरोसा नहीं जगा सका। संगठन विस्तार की कमी भी मनसे के लिए नुकसानदेह रही।

6- बीजेपी का आक्रामक विस्तार

बीएमसी चुनाव में बीजेपी ने आक्रामक रणनीति अपनाई और खुद को एक मजबूत, संगठित विकल्प के तौर पर पेश किया। शिंदे शिवसेना को बराबर महत्व दिया गया, जिससे महायुति और मजबूत होती नजर आई।

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