मीरा-भाईंदर में अवैध निर्माण का संगठित खेल, मैंग्रोव, आरक्षित भूमि और राष्ट्रीय उद्यान तक अतिक्रमण

Mumbai Mangrove Encroachment: मीरा-भाईंदर में मैंग्रोव, आरक्षित भूमि और संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के आसपास अवैध निर्माण के संगठित खेल ने प्रशासनिक भूमिका और राजनीतिक संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े किए।
mangrove encroachment Mumbai
Sanjay Gandhi National Park violation (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Mira Bhayandar Illegal Construction: मीरा-भाईंदर शहर में अनधिकृत निर्माण अब महज़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित और संरक्षित नेटवर्क का रूप ले चुका है। संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान से सटे पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों, मैंग्रोव वन भूमि और मीरा-भाईंदर महानगरपालिका की आरक्षित जमीनों पर खुलेआम चल रहा निर्माण कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

क्या मनपा प्रशासन जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है? क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना यह सब संभव है? और क्या पर्यावरण की कीमत पर एक सुनियोजित अवैध रियल एस्टेट बाजार फल-फूल रहा है?

कौन दे रहा है संरक्षण?

मीरा-भाईंदर मनपा क्षेत्र लगभग 79.40 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें करीब 40 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी, मैंग्रोव और प्राकृतिक संसाधनों से युक्त संवेदनशील क्षेत्र है। इन इलाकों में किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है। इसके बावजूद प्रभाग क्रमांक 01 और 06 के अंतर्गत उत्तन, माशाचा पाड़ा, मांडवी पाड़ा, मुर्धा, मोरवा और नमक भूमि (साल्ट लैंड) जैसे क्षेत्रों में अवैध निर्माणों की भरमार है।

पर्यावरण कानून कागज़ों में, ज़मीन पर कंक्रीट

नियमों के अनुसार, संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से 10 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार का निर्माण पूर्णतः निषिद्ध है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह नियम केवल कागज़ों तक सीमित नजर आता है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि वन विभाग और मनपा प्रशासन की चुप्पी बेहद संदिग्ध है।

मीरा-भाईंदर में अवैध निर्माण का संगठित खेल

प्रभाग समितियां या अवैध निर्माणों की शरणस्थली?

प्रभाग समिति क्रमांक 1 और 6 को स्थानीय लोग अब अवैध निर्माणों का गढ़ कहने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक, पहले कागज, टीन या प्लास्टिक के अस्थायी ढांचे खड़े किए जाते हैं, जो कुछ ही समय में पक्के मकानों में तब्दील हो जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि निर्माण शुरू होने पर कोई नोटिस नहीं दिया जाता और निर्माण पूरा होने तक कोई रोक नहीं लगती। बाद में कार्रवाई केवल चुनिंदा ढांचों पर कर औपचारिकता निभाई जाती है।

आयुक्त के आदेश और ज़मीनी सच्चाई में अंतर

हाल ही में आयुक्त राधाबिनोद शर्मा के निर्देश पर उत्तन क्षेत्र में कुछ अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की गई, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह कार्रवाई छोटे और कमजोर ढांचों तक ही सीमित रही। बड़े और प्रभावशाली निर्माण जस के तस खड़े हैं। सवाल उठता है कि किस आधार पर तय किया जाता है कि कौन सा अवैध निर्माण तोड़ा जाएगा और किसे छोड़ा जाएगा?

दलाल-नेता-अधिकारी गठजोड़ के आरोप

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि अवैध निर्माणों के पीछे निर्माण दलालों, स्थानीय नेताओं और कुछ अधिकारियों की त्रिकोणीय सांठगांठ काम कर रही है। प्रवासी मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को सस्ते मकानों का लालच देकर अवैध ढांचे खड़े किए जाते हैं। लेन-देन स्टांप पेपर पर किया जाता है, ताकि भविष्य में जिम्मेदारी तय न हो सके।

मीरा-भाईंदर में अवैध निर्माण का संगठित खेल

बिना एनओसी बिजली-पानी कैसे?

पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी निर्माण को बिजली या पानी का कनेक्शन देने से पहले मनपा की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अनिवार्य है। इसके बावजूद इन इलाकों में बिजली, पानी और पक्की सड़कें कैसे पहुंच रही हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के जरिए बिना एनओसी अवैध ढांचों को वैध सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जबकि नियमित कर चुकाने वाले नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों मनपा के चक्कर काटते हैं।

शहर के बुनियादी ढांचे पर बढ़ता बोझ

मीरा-भाईंदर की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। सीमित संसाधनों के बीच मनपा पहले से ही आर्थिक दबाव में है। ऐसे में अवैध निर्माणों के कारण पानी की किल्लत, सीवरेज समस्या, ट्रैफिक जाम और कचरा प्रबंधन संकट दिन-ब-दिन गंभीर होता जा रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि मैंग्रोव और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को नुकसान पहुंचा, तो शहर को बाढ़ जैसे हालात का सामना करना पड़ सकता है।

प्रशासन की चुप्पी: लापरवाही या मिलीभगत?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मनपा प्रशासन को इन अवैध निर्माणों की जानकारी नहीं है, या फिर जानकारी होने के बावजूद जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? लगातार शिकायतों, मीडिया रिपोर्टों और नागरिक विरोध के बावजूद यदि अवैध निर्माण फल-फूल रहे हैं, तो यह महज़ लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्थागत विफलता का संकेत है।

स्थानीय लोगों की मांग

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि सभी अवैध निर्माणों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, मैंग्रोव और आरक्षित भूमि पर बने ढांचों को तत्काल ध्वस्त किया जाए, बिना एनओसी दी गई सुविधाओं की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए और दोषी अधिकारियों, दलालों व राजनीतिक संरक्षकों पर आपराधिक कार्रवाई की जाए।

(इनपुटः विनोद मिश्रा)

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