बांस की खेती को सरकार दे रही बढ़ावा, रोजगार का खुलेगा नया द्वार, इन चीजों के लिए बढ़ी मांग

Employment Opportunity: वर्तमान में रोजगार के अवसर बढ़ाने, आमदनी में वृद्धि के लिए बांस, छोटे व मझोले उद्यमों के क्षेत्र के विस्तार का भी आधार बन सकता है।
Employment Opportunity: वर्तमान में रोजगार के अवसर बढ़ाने, आमदनी में वृद्धि के लिए बांस, छोटे व मझोले उद्यमों के क्षेत्र के विस्तार का भी आधार बन सकता है।
बांस की खेती (सौजन्य-नवभारत)
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Gondia News: रोजगार के अवसर बढ़ाने, आमदनी में वृद्धि के लिए बांस, छोटे व मझोले उद्यमों के क्षेत्र के विस्तार का भी आधार बन सकता है। यह ग्रामीण गरीबी को कम करने और आजीविका सुरक्षा में कारगर भूमिका निभा सकता है। जरूरत है योजनाओं को समूचित तौर पर लागू करने की। वन हक कानून के तहत ग्राम सभा की बांबू पर मालकी मान्य की गई है।

जिससे ग्रामीण क्षेत्र में बांबू पर आधारित उद्योग शुरू कर गांव में ही रोजगार के अवसर निर्माण करने किए जा सकते हैं। अन्य सफलों व खेती की तरह बांस उत्पादन पर ध्यान दिया जाए तो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने में मदद हो सकती है। सरकार ने किसानों की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। सरकार द्वारा कृषि में कई प्रयोग किए गए हैं।

बांस की खेती के लिए सरकारी अनुदान

सरकार बांस की खेती से अधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर रही है। बांस की खेती के लिए सरकार अनुदान भी देती है। बांस की लगभग 1,400 किस्में हैं जो विभिन्न जलवायु और वातावरण के अनुकूल होती हैं। बांस बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है। बांस की कुछ प्रजातियां प्रति दिन दो से तीन फीट तक बढ़ सकती हैं। बांस का उपयोग बल्ली, सीढ़ी, टोकरी, चटाई टोकरी, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र बनाने सहित अन्य साज-सज्जा का सामान बनाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा कागज बनाने में इसका उपयोग होता है। अब तो घरों को आधुनिक लुक देने में भी बांस का प्रयोग किया जाने लगा है। इसके अलावा कहीं-कहीं इसकी खाने योज्य प्रजातियों से अचार भी बनाया जाता है। एग्रोफोरेस्ट्री, टाइल्स, टिंबर, बायो-एनर्जी इस क्षेत्रों में भी बांस की मांग होती है। महाराष्ट्र बांबू विकास मंडल द्वारा विभिन्न उपक्रम चलाए जाते है।

कम पानी व उर्वरक की आवश्यकता

सरकार बांस के रोपण को प्रोत्साहित व बांस की खेती करने वाले किसानों को आर्थिक मदद का प्रावधान है। बांस की विशेषता यह है कि इसमें बहुत कम पानी और उर्वरक की आवश्यकता होती है। साथ ही इस फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने से फसल के लिए कीटनाशकों का प्रयोग भी कम हो जाता है। पिछले बीस वर्षों में एशिया में बांस का उत्पादन तेजी से बढ़ा है।

महाराष्ट्र में मैनवेल, कटंग काटस, कोंड्या मेस, पीला बांस, चिवली यह प्रजातियां पाई जाती हैं। बांस के रोपण के लगभग पांच वर्ष बाद इसकी उपज प्राप्त होती है। उसके बाद प्रति माह अच्छी कमाई की जा सकती है। महाराष्ट्र बांस विकास बोर्ड किसानों को टिशू कल्चर बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित करता है। इस पर ध्यान दिया जाए तो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने में मदद करेगी।

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