
अकोला. मकर संक्रांति (Makar Sankranti 2024) के अवसर पर पतंग उड़ाने की एक परंपरा है जो कि अनेक वर्षों से चली आ रही है. यहां के विभिन्न पार्टियों के नेता और जनप्रतिनिधि भी पतंगबाजी का शौक रखते हैं. इन जनप्रतिनिधियों का कहना है कि, बचपन में इन्होंने काफी पतंगें उड़ाई हैं और काटी भी हैं. कुछ जनप्रतिनिधियों ने बताया कि वे आज भी समय मिलने पर अपना पतंग उड़ाने का शौक पूरा करते हैं. प्रस्तुत है पतंग उड़ाने को लेकर यहां के जनप्रतिनिधियों और व्यवसायियों के विचार.
इस बारे में पूर्व मंत्री प्रा.अजहर हुसैन का कहना है कि, उनके बचपन के दिनों में उन्होंने कई बार पतंगे उड़ाई हैं और कई पतंगे काटी भी हैं. उन्होंने बताया कि बचपन में उन्हें पतंग उड़ाने का काफी शौक रहा है. अब उनके पौत्र पतंग उड़ाते हैं और वे उन्हें इसमें पूरा सहयोग देते हैं. उन्होंने बताया कि उनके बचपन में पतंग उड़ाने के लिए रेडीमेड मांजा नहीं मिलता था. तब वे कांच पीसकर मांजा तैयार किया करते थे. खुद अपने हाथों से मांजा घोटने का एक अलग ही मजा रहता था. अब तो रेडीमेड का जमाना आ गया है.
विधान परिषद के विधायक वसंत खंडेलवाल का कहना है कि, बचपन में तो उन्होंने बहुत पतंगें उड़ाई हैं इसी तरह कई पतंगें काटी भी थी, यह तो बचपन की बातें हो गयीं लेकिन अभी भी वे पतंग उड़ाने का शौक रखते हैं. संक्रांति के अवसर पर जब भी समय मिलता है वे पतंग उड़ाने का अपना यह शौक पूरा करते हैं. लेकिन व्यस्तता के कारण समय बहुत कम मिल पाता है. उन्होंने कहा कि, पतंग उड़ाना भी एक कला है.
विधायक रणधीर सावरकर ने कहा कि, बचपन में तो काफी पतंगे उड़ाई हैं. लेकिन अभी भी मकर संक्रांति के अवसर पर वे पतंग उड़ाने का अपना यह शौक पूरा करते हैं. उन्होंने बताया कि पतंग उड़ाने का अपना एक अलग ही आनंद है. इसमें उम्र का कोई सवाल ही नहीं है. व्यस्तता के कारण समय बहुत कम मिल पाता है. लेकिन समय मिलने पर संक्रांति पर पतंग उड़ाते जरूर हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें पतंग उड़ाने का बहुत शौक है.
प्रदेश भाजपा उत्तर भारतीय मोर्चा के उपाध्यक्ष रामप्रकाश मिश्रा ने कहा कि, अब व्यस्तता के कारण बिलकुल समय नहीं मिल पाता है लेकिन बचपन में बहुत पतंगे उड़ाई हैं और बहुत पतंगे काटी भी हैं लेकिन अब समय न मिलने के कारण धीरे धीरे पतंग उड़ाने का रुझान अब कम हो गया है. लेकिन हां पतंग उड़ाना भूला नहीं हूं.
विधायक हरीश पिंपले ने बताया कि, उनका बांसों का व्यापार होने के कारण उन्होंने बचपन में पतंग उड़ाने के धागे की चक्रियां बेची भी हैं और पतंगें खुद उड़ाई भी हैं. लेकिन अब व्यस्तता के कारण पतंग उड़ाना बंद हो गया है. उन्होंने कहा कि, वैसे भी यह शौक उन्हें बचपन में ही रहा है.
स्थानीय रियल ईस्टेट व्यवसायी रवि धानुका ने कहा कि, बचपन में उन्होंने अपने हाथों से पतंगे बनाकर उड़ाई हैं, खुद मांजा भी तैयार किया है. लेकिन उन्हें अब पतंग उड़ाने का शौक नहीं रहा है. यह शौक बचपन के साथ ही पीछे छूट गया है. लेकिन पतंग उड़ाने के वे दिन स्मरण पटल पर अभी भी अंकित हैं.
विदर्भ चेम्बर ऑफ कॉमर्स एन्ड इंडस्ट्री के अध्यक्ष निकेश गुप्ता ने कहा कि, बचपन में पतंग उड़ाने का बहुत शौक था, बचपन में बहुत पतंगें उड़ाई और काटी भी थी लेकिन धीरे धीरे बचपन पीछे छूट गया और पतंग उड़ाने का शौक भी पीछे रह गया. अब तक जीवन की व्यस्तता के कारण इस ओर ध्यान नहीं जाता है.






