ड्रैगन की नींद उड़ी! छाती पर गरजेंगे सुखोई और राफेल, LAC पर IAF की स्पेशल तैयारी

Nyoma Airfield: BRO द्वारा प्रोजेक्ट हिमांक के तहत बनाए जा रहे 2.7 किमी के रनवे का काम अक्टूबर 2025 तक पूरा होने वाला है, जिससे राफेल, सुखोई-30 MKI और LCA तेजस जैसे HeF'j जेट आसानी से उड़ान भर सकेंगे।
Nyoma Airfield Laddakh
कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Published on
Updated on

Nyoma Airfield: भारत न सिर्फ अपनी सीमाओं को अभेद्य दुर्ग में परिवर्तित कर रहा है, बल्कि भविष्य में किसी भी ख़तरे से निपटने के लिए पड़ोसी दुश्मनों के बेहद करीब सैन्य ढांचा भी तैयार कर रहा है। ताकि किसी भी ख़तरे का माकूल जवाब दिया जा सके। इसी कड़ी में, LAC पर चीन की बढ़ती आक्रामकता और सैन्य बुनियादी ढाँचे के विस्तार के जवाब में, भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को निर्णायक मोड़ दे दिया है।

अक्टूबर 2025 तक न्योमा में पूरी तरह से चालू लड़ाकू एयरफील्ड बन जाएगा, यानी राफेल-सुखोई जैसे लड़ाकू विमान यहाँ से पूरी तरह से संचालित होंगे। न्योमा एयरफील्ड चीनी सीमा के बेहद क़रीब, 13,700 फ़ीट की ऊँचाई पर बनाया जा रहा है। जो LAC से 50 किमी से भी कम दूरी पर है। जिससे यह भारत का सबसे ऊँचा लड़ाकू-सक्षम एयरफ़ील्ड बन जाएगा।

अक्टूबर तक पूरा हो जाएगा काम

बता दें, BRO द्वारा प्रोजेक्ट हिमांक के तहत बनाए जा रहे 2.7 किलोमीटर के रनवे का काम अक्टूबर 2025 तक पूरा होने वाला है, जिससे राफेल, सुखोई-30 MKI और LCA तेजस जैसे लड़ाकू विमान आसानी से उड़ान भर सकेंगे। वास्तविक नियंत्रण रेखा से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित न्योमा, लेह और थोईस जैसे दूरस्थ हवाई अड्डों की तुलना में दुश्मन के ठिकानों पर त्वरित प्रतिक्रिया और त्वरित हमलों की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा।

क्यों खास है न्योमा एयरफील्ड?

इस उन्नत एयरफील्ड में बम-रोधी हैंगर, एक आधुनिक हवाई यातायात नियंत्रण भवन, गोला-बारूद बंकर और मज़बूत आश्रय स्थल जैसी सुविधाएं होंगी। इस परियोजना का नेतृत्व एक महिला लड़ाकू इंजीनियर, कर्नल पोनांग डोमिंग कर रही हैं। भारतीय वायु सेना भी -40° सेल्सियस तक संचालने के लिए जेट इंजनों को अनुकूलित कर रही है।

DBO तक बनाया जा रहा नया रास्ता

भारतीय सैनिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण, दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) तक एक नया वैकल्पिक सड़क मार्ग भी बनाया जा रहा है, जो सियाचिन बेस कैंप के पास सासामा से शुरू होगा। आपको बता दें, यह मार्ग 17,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित सासेर ला दर्रे से होकर श्योक नदी में उतरेगा और डीबीओ सड़क से जुड़कर डीबीओ तक एक छोटा और अधिक सुरक्षित मार्ग प्रदान करेगा।

साथ ही, मौजूदा 255 किलोमीटर लंबी दारबुक-श्योक-डीबीओ (डीएसडीबीओ) सड़क, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा तक जाती है, चीनी ठिकानों के निकट होने के कारण संवेदनशील है। इस समस्या से निपटने के लिए, बीआरओ सासोमा-सासेर ला-सासेर ब्रांचगा-गपशान-डीबीओ एक्सिस नामक एक वैकल्पिक सड़क का निर्माण कर रहा है, जिसके 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है।

इसका सामरिक महत्व क्या होगा?

डीबीओ का सामरिक महत्व काराकोरम दर्रे और अक्साई चिन से इसकी निकटता में निहित है, जहां चीन ने तिब्बत में पांच हवाई क्षेत्र और उन्नत बुनियादी ढांचा विकसित किया है। यह वैकल्पिक सड़क डीबीओ की एक रसद केंद्र के रूप में भूमिका को और बढ़ाएगी, जिससे नियमित रूप से एएन-32 उड़ानें और संभावित रूप से लड़ाकू जेट संचालन संभव हो सकेगा।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com