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यूपी की नाकामी के बाद असम की ‘अग्निपरीक्षा’, हिमंत से सीधी टक्कर के बीच प्रियंका रोकेंगी BJP का रथ?
Congress Screening Committee: यूपी में मिली नाकामी के बाद प्रियंका गांधी एक बार फिर लीड रोल में दिखाई देने जा रही हैं। कांग्रेस ने 2026 के असम चुनाव के लिए प्रियंका गांधी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है।
- Written By: प्रतीक पांडेय

प्रियंका गांधी और हिमंत सरमा, फोटो- सोशल मीडिया
Assam Assembly Election 2026: 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस ने अपनी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा फैसला प्रियंका गांधी को असम स्क्रीनिंग कमेटी का प्रमुख बनाकर ले लिया गया है। यह पहली बार है जब गांधी परिवार का कोई सदस्य टिकट बंटवारे की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का नेतृत्व करेगा। आइए समझते हैं असम में होने वाले चुनाव का पूरा गुणा-गणित।
कांग्रेस नेतृत्व ने 2026 में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों-असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरील के लिए स्क्रीनिंग कमेटियों का गठन कर दिया है। इस पूरी कवायद में सबसे अधिक ध्यान प्रियंका गांधी वाड्रा की नियुक्ति ने खींचा है। पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी को असम की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। राजनीतिक गलियारों में इसे ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले गांधी परिवार के किसी भी सदस्य ने स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में काम नहीं किया है।
क्या करेगी असम में बनी ये स्क्रीनिंग कमेटी?
इस कमेटी की प्राथमिक जिम्मेदारी प्रत्येक विधानसभा सीट के लिए कम से कम तीन संभावित उम्मीदवारों के नाम तय करना और उन्हें अंतिम मुहर के लिए केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) को भेजना है। प्रियंका के साथ इस टीम में लोकसभा सांसद इमरान मसूद, सप्तगिरि उलाका और श्रीवेला प्रसाद को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
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असम का राजनीतिक इतिहास: कांग्रेस के दबदबे से भाजपा के उदय तक
असम की राजनीति का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1952 से लेकर अब तक राज्य ने 15 विधानसभा चुनाव और 16 मुख्यमंत्री देखे हैं। शुरुआती दौर में कांग्रेस का जबरदस्त दबदबा था, जिसमें विष्णु राम मेढ़ी पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद बीपी चलिहा ने 1957 से 1970 तक एक लंबा कार्यकाल संभाला। 1972 में बांग्लादेश की आजादी के बाद शरत चंद्र सिन्हा के नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर सरकार बनाई।
राज्य ने कई बार देखे राष्ट्रपति शासन
हालांकि, 1978 में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी जब जनता पार्टी के गोलप बोरबोरा मुख्यमंत्री बने। इसके बाद का दौर राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार लगने वाले राष्ट्रपति शासन का रहा। 1979, 1981 और 1982 में राज्य ने कई बार राष्ट्रपति शासन देखा। 1985 में असम गण परिषद के प्रफुल्ल कुमार महंत ने सत्ता संभाली, लेकिन 2001 से 2016 तक तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार 15 साल राज किया। वर्तमान में 2016 से भाजपा सत्ता में है, जिसकी शुरुआत सर्वानंद सोनोवाल से हुई थी और अब हिमंत बिस्वा सरमा राज्य की कमान संभाल रहे हैं।

हिमंत बनाम गोगोई: प्रियंका की एंट्री से बदलेगा समीकरण?
असम इकलौता ऐसा राज्य है जहां आगामी चुनावों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से है। वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लगातार कांग्रेस नेतृत्व पर हमलावर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने युवा चेहरे गौरव गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है, और अब प्रियंका गांधी की सक्रियता से गोगोई की स्थिति और मजबूत होने की उम्मीद है। उम्मीद ये भी है कि प्रियंका की मौजूदगी न केवल टिकट चयन में पारदर्शिता लाएगी, बल्कि संगठन में नई ऊर्जा भी भरेगी।
2021 की हार और 1.6% का गणित
2021 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक कड़ा सबक थे। उस समय भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोत के बीच वोट शेयर का अंतर केवल 1.6% था। इसी मामूली अंतर को पाटने के लिए प्रियंका गांधी को मैदान में उतारा गया है। असम की 126 सीटों में से कांग्रेस करीब 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, जबकि शेष 26 सीटें उसके सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जा सकती हैं। प्रियंका की भूमिका गठबंधन को एकजुट रखने और सीट बंटवारे के जटिल मुद्दों को सुलझाने में भी अहम होगी।
क्या उत्तर प्रदेश से सबक ले चुकी हैं प्रियंका गांधी?
प्रियंका गांधी के लिए यह राह आसान नहीं होगी। उनका पिछला अनुभव उत्तर प्रदेश में चुनौतीपूर्ण रहा था, जहां 2022 के चुनाव में ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के बावजूद पार्टी महज दो सीटों पर सिमट गई थी। जानकारों का मानना है कि यूपी में काडर की कमी और जनता से अलगाव हार की बड़ी वजह थी। हालांकि, असम में कांग्रेस का संगठन यूपी की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है, जिससे प्रियंका को बेहतर परिणाम देने की उम्मीद है।
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केरल से बंगाल तक इन राज्यों में भी बिछेगी बिसात
असम के साथ-साथ कांग्रेस ने अन्य राज्यों में भी अनुभवी चेहरों को आगे किया है। केरल में जहां सत्ता परिवर्तन की लहर की उम्मीद है, वहां मधुसूदन मिस्त्री को कमान दी गई है। तमिलनाडु और पुडुचेरी में टीएस सिंह देव गठबंधन के साथ तालमेल बिठाएंगे, जबकि पश्चिम बंगाल में बीके हरिप्रसाद को जिम्मेदारी दी गई है जहां पार्टी सभी 294 सीटों पर अकेले लड़ने पर विचार कर रही है।
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