

Priyanka Gandhi: कांग्रेस महासचिव और असम के लिए स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष प्रियंका गांधी असम की असम से दिल्ली वापसी हो चुकी है। राजधानी पहुंचते ही उन्होंने राजधानी में एक बड़ी मीटिंग की। शायद यह पहली बार है जब किसी राज्य की स्क्रीनिंग कमेटी के मुखियो के दौरे को इतनी अहमियत दी गई है।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि प्रियंका के दौरै को महत्व सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा रहा है कि उनके नाम के पीछे गांधी जुड़ा हुआ है। क्योंकि स्क्रीनिंग कमेटी के दूसरे सदस्यों में कर्नाटक के डिप्टी चीफ मिनिस्टर डीके शिवकुमार, छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ मिनिस्टर भूपेश बघेल और सांसद इमरान मसूद जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
प्रियंका गांधी असम के 21 विधायक, तीन सांसद, जिला प्रेसिडेंट और ब्लॉक हेड से मिल चुकी हैं। हालांकि, प्रियंका गांधी को असम में पार्टी के अंदर बगावत और सांगठनिक चुनौतियों समेत बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भूपेन बोरा का कांग्रेस पार्टी छोड़ना पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। बोरा पिछले 30 सालों से कांग्रेस के सदस्य थे। वह राज्य कांग्रेस के मुखिया भी रह चुके हैं।
गौरव गोगोई को असम का प्रदेश प्रेसिडेंट बनाए जाने के बाद से बोरा असहज महसूस कर रहे थे। भूपेन बोरा ने गौरव गोगोई पर रकीबुल हुसैन को ज़्यादा तरजीह देने का आरोप लगाया है। भूपेन बोरा ने ऐलान किया है कि 8 मार्च को उनके साथ कई और कांग्रेस नेता भी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होंगे।
भूपेन बोरा के कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रियंका गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखना होगा, क्योंकि पिछले कई सालों में कई MLA पार्टी छोड़ चुके हैं। प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी प्राथमिकता चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी से नेताओं के इस पलायन को रोकना होगा।
प्रियंका को असम में हिमंत बिस्वा सरमा के बनाए मजबूत भाजपा संगठन का मुकाबला करना होगा। तरुण गोगोई, जो कभी लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहे, के जाने के बाद कांग्रेस कमजोर हुई, जबकि हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा मजबूत हुई, और अब पूरे असम में भाजपा की मजबूत पकड़ है।
असम में कांग्रेस के लिए एक मजबूत गठबंधन बनाना भी एक बड़ी चुनौती है। असम में गठबंधन बहुत जरूरी हैं। पिछली बार चुनाव NDA और महाजोत (कांग्रेस गठबंधन) के बीच था। NDA ने 126 विधानसभा सीटों में से 75 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस की महाजोत ने 50 सीटें जीतीं।
वोटों का प्रतिशत देखें, तो NDA को 43.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि महाजोत को 42.3 प्रतिशत, यानी सिर्फ़ 1.6 प्रतिशत का अंतर है। यहां प्रियंका गांधी का नाम काम आ सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि कांग्रेस किन पार्टियों के साथ हाथ मिलाएगी। हालांकि यह बात साफ है कि इस बार कांग्रेस बदरुद्दीन अजमल के साथ अलायंस नहीं करना चाहती है।
अजमल को धुबरी लोकसभा चुनाव में रकीबुल हुसैन ने 10 लाख वोटों से हराया था। कांग्रेस बदरुद्दीन अजमल की पार्टी को भाजपा की B-टीम कह रही है। इस बार कांग्रेस लेफ्ट पार्टियों के अलावा अखिल गोगोई की रायजोर दल के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
असम में कई और छोटी पार्टियां हैं जिनके साथ कांग्रेस अलायंस कर सकती है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि असम में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा के अग्रेसिव पॉलिटिकल स्टाइल का मुकाबला करना है। इस मामले में प्रियंका गांधी का अपना पॉलिटिकल स्टाइल असरदार हो सकता है, क्योंकि वह भी प्रियंका गांधी पर सीधे कमेंट करने से बचेंगी।
हालांकि, जब प्रियंका गांधी को स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया था तो कहा गया था कि राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को मुश्किल काम देकर फंसा दिया है। लेकिन प्रियंका गांधी की टीम का कहना है कि चुनौतिया जरूर हैं मगर उन्हें मुश्किल काम पसंद हैं।
दूसरी तरफ प्रियंका गांधी जानती हैं कि असम में समय लगेगा। ऐसे में अगर वह आगामी चुनाव में कांग्रेस को सत्ता दिलाने में कामयाब होती हैं तो यह उनकी लीडरशिप क्वालिटी के असली इम्तहान में पास होने सरीखा माना जाएगा और इससे कांग्रेस में उनकी अहमियत और ज्यादा बढ़ जाएगी।