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Ayodhya Ram Mandir : 1526 में विवाद के जन्म से लेकर 2024 के जश्न तक, राम मंदिर की पहली वर्षगांठ पर पढ़िए पूरी दास्तान
एक वक्त ऐसा भी था जब किसी ने ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी 500 सालों से चले आ रहे विवाद का अंत होगा, अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनेगा और देश रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ मनाएगा।
- Written By: अभिषेक सिंह

अयोध्या राम मंदिर (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: आज यानी शनिवार 11 जनवरी को अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ मनाई जा रही है। रामनगरी समेत समूचे देश में उत्सव का माहौल है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब किसी ने ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी 500 सालों से चले आ रहे विवाद का अंत होगा, अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनेगा और देश रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ मनाएगा। यह आसान नहीं था लेकिन हुआ। यही वजह है कि हम आज आपको वह पूरी कहानी बताने जा रहें हैं कि अयोध्या में विवाद कैसे शुरू हुआ और यह किस तरह सुखद अंत तक पहुंचा।
चलिए अब आपको इतिहास में ले चलते हैं। कहानी शुरू होती है 1526 से। यही वो साल था जब मुगल शासक बाबर भारत आया था। दो साल बाद बाबर के गवर्नर मीरबाकी ने अयोध्या में मस्जिद बनवाई। ये मस्जिद उसी जगह पर बनाई गई थी जहां भगवान राम का जन्म हुआ था। बाबर के सम्मान में मीरबाकी ने इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा। ये वो दौर था जब मुगल शासन पूरे देश में फैल रहा था।
1528 से 1853 तक मुगलों और नवाबों के शासन के दौरान हिंदू इस मामले में बहुत मुखर नहीं हो पाए। 19वीं सदी में मुगलों और नवाबों का शासन कमजोर पड़ने लगा। अंग्रेजों का शासन प्रभावी हो गया था। इसी दौर में हिंदुओं ने ये मुद्दा उठाया और कहा कि भगवान राम की जन्मभूमि का मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई है। इसके बाद रामलला की जन्मभूमि को वापस पाने की लड़ाई शुरू हुई।
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1858 में हुई पहली एफआईआर
मीरबाकी द्वारा मस्जिद बनवाए जाने के 330 साल बाद 1858 में यह लड़ाई कानूनी हो गई, जब पहली बार परिसर में हवन और पूजा करने पर एफआईआर दर्ज की गई। अयोध्या रीविजिटेड नामक पुस्तक के अनुसार, 1 दिसंबर 1858 को अवध के थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि परिसर में एक चबूतरा बना दिया गया है। यह पहला कानूनी दस्तावेज है, जिसमें परिसर के अंदर राम के प्रतीक की मौजूदगी के सबूत हैं। इसके बाद तार की बाड़ लगाई गई और विवादित भूमि के भीतरी और बाहरी परिसर में मुसलमानों और हिंदुओं को अलग-अलग पूजा और प्रार्थना करने की अनुमति दी गई।
1885 में अदालत पहुंची लड़ाई
1858 की घटना के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि की लड़ाई अदालत में पहुंची, जब निर्मोही अखाड़े के प्रमुख रघुबर दास ने फैजाबाद की अदालत में मालिकाना हक को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया। दास ने मांग की कि बाबरी ढांचे के बाहरी प्रांगण में राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का किया जाए और उस पर छत डाली जाए। जज ने फैसला सुनाया कि हिंदुओं को वहां पूजा करने का अधिकार है, लेकिन वे जिला मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का करने और उस पर छत डालने की इजाजत नहीं दे सकते।
1949 में मूर्तियों का प्रकटीकरण
एक तरफ जहां आजादी हासिल करने के लिए देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन जारी था, वहीं दूसरी तरफ राम जन्मभूमि की लड़ाई भी जारी थी। देश की आजादी के दो साल बाद 22 दिसंबर 1949 को ढांचे के अंदर गुंबद के नीचे मूर्तियां प्रकट हुईं। जिसके बाद राममंदिर निर्माण की मांग और तेज हो गई।
1950 में आजादी के बाद पहला मुकदमा
आजादी के बाद पहला मुकदमा हिंदू महासभा के सदस्य गोपाल सिंह विशारदा ने 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में दायर किया था। विशारदा ने ढांचे के मुख्य गुंबद के नीचे स्थित भगवान की मूर्तियों की पूजा की मांग की थी। करीब 11 महीने बाद 5 दिसंबर 1950 को महंत रामचंद्र परमहंस ने भी ऐसी ही मांग करते हुए सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर किया। मुकदमे में दूसरे पक्ष को संबंधित स्थल पर पूजा में बाधा डालने से रोकने की मांग की गई थी। 3 मार्च 1951 को गोपाल सिंह विशारदा केस में अदालत ने मुस्लिम पक्ष को पूजा में बाधा न डालने का निर्देश दिया। परमहंस द्वारा दायर मुकदमे में भी ऐसा ही आदेश दिया गया था।
1959 में मांगी गई पूजा की अनुमति
17 दिसंबर 1959 को निर्मोही अखाड़े के छह लोगों ने रामानंद संप्रदाय की ओर से मुकदमा दायर कर इस स्थान पर अपना दावा पेश किया। उन्होंने यह भी मांग की कि रिसीवर प्रियादत्त राम को हटाया जाए और उन्हें पूजा करने की अनुमति दी जाए। यह उनका अधिकार है। मुकदमों की श्रृंखला में 18 दिसंबर 1961 को एक और मुकदमा दायर किया गया। यह मुकदमा उत्तर प्रदेश के केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दायर किया था। कहा गया कि यह स्थान मुसलमानों का है। ढांचे को हिंदुओं से लेकर मुसलमानों को दिया जाना चाहिए। ढांचे के अंदर से मूर्तियां हटाई जानी चाहिए। ये मुकदमे अदालत में चलते रहे। फैसलों पर बात करने से पहले आइए राम के काम के लिए किए गए कुछ अन्य आंदोलनों की ओर चलते हैं।
1982 में चला धर्मस्थल मुक्ति अभियान
घटना 1982 की है। यह वही साल था जब विश्व हिंदू परिषद ने राम, कृष्ण और शिव के स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण को साजिश करार देते हुए उनकी मुक्ति के लिए अभियान चलाने की घोषणा की थी। दो साल बाद 8 अप्रैल 1984 को दिल्ली में संतों और हिंदू नेताओं ने अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि स्थल को मुक्त कराने और ताला खोलने के लिए आंदोलन शुरू करने का फैसला किया।
1986 में खुला परिसर का ताला
चूंकि हमने मुकदमों की बात कर ली है, तो चलिए फिर से कानूनी लड़ाई की ओर चलते हैं और फैसलों की बात करते हैं। 1 फरवरी 1986 को एक फैसला आया जब फैजाबाद के जिला जज केएम पांडे ने स्थानीय अधिवक्ता उमेश पांडे की अर्जी पर इस जगह का ताला खोलने का आदेश दिया। इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दायर अपील खारिज कर दी गई।
1989 में मंदिर का शिलान्यास
जनवरी 1989 में प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान मंदिर निर्माण के लिए गांव-गांव में शिला पूजन का निर्णय लिया गया। साथ ही 9 नवंबर 1989 को श्री राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर का शिलान्यास करने की घोषणा की गई। काफी विवाद और खींचतान के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शिलान्यास की अनुमति दी। शिलान्यास बिहार निवासी कामेश्वर चौपाल ने किया।
1990 में आडवाणी ने दी आंदोलन को धार
1990 के दशक में आंदोलन जोर पकड़ रहा था। इसी बीच सितंबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा शुरू की। इस यात्रा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को और धार दी। देश की राजनीति तेजी से बदल रही थी। आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के साथ ही केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। भाजपा के समर्थन से बनी जनता दल की सरकार गिर गई। कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। यह सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चली। नए चुनाव हुए और एक बार फिर कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आई। इन सबके बीच वो ऐतिहासिक तारीख आई, जिसका जिक्र किए बिना ये कहानी पूरी नहीं हो सकती।
1992 में गिराया गया विवादित ढांचा
तारीख थी 6 दिसंबर 1992, इस दिन हजारों की संख्या में अयोध्या पहुंचे कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया। इसकी जगह उन्होंने उसी शाम एक अस्थायी मंदिर बनाया और पूजा-अर्चना शुरू कर दी। केंद्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने राज्य की कल्याण सिंह सरकार समेत अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया। उत्तर प्रदेश समेत देश में कई जगहों पर सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि थाने में ढांचा विध्वंस मामले में कई भाजपा नेताओं समेत हजारों लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। इसके साथ ही राम के काम की कानूनी लड़ाई में मुकदमों की संख्या बढ़ने लगी।
1993 में मिली दर्शन-पूजन की अनुमति
बाबरी विध्वंस के दो दिन बाद 8 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया गया। वकील हरिशंकर जैन ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में अपील की कि भगवान भूखे हैं। राम भोग की इजाजत दी जाए। करीब 25 दिन बाद 1 जनवरी 1993 को जज हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की इजाजत दे दी। 7 जनवरी 1993 को केंद्र सरकार ने यहां ढांचा स्थल और कल्याण सिंह सरकार द्वारा ट्रस्ट को दी गई जमीन मिलाकर कुल 67 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली।
2002 में मालिकाना हक पर सुनवाई
अप्रैल 2002 में, उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने विवादित स्थल के स्वामित्व को निर्धारित करने के लिए सुनवाई शुरू की। 5 मार्च 2003 को, उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को विवादित स्थल की खुदाई करने का निर्देश दिया। 22 अगस्त 2003 को, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने न्यायालय को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें कहा गया कि विवादित स्थल पर जमीन के नीचे एक विशाल हिंदू धार्मिक संरचना (मंदिर) थी।
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस जगह को तीन पक्षों- श्री राम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था। जजों ने केंद्रीय गुंबद के नीचे की जगह को जन्मस्थान माना जहां मूर्तियां रखी गई थीं। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की पेशकश की। साथ ही कहा कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो वह इसके लिए भी तैयार है।
2017 में SC ने की मध्यस्थता की पेशकश
अयोध्या में राम जन्मभूमि की लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई थी। 21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की पेशकश की थी। साथ ही कहा था कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो वह इसके लिए तैयार है। लेकिन आखिरकार बात नहीं बनी।
2019 में आया ‘सुप्रीम’ फैसला
6 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना सुनवाई शुरू की। 16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में लगातार 40 दिनों तक सुनवाई हुई थी। जिसके बाद सर्वोच्च अदालत ने सृष्टि के ‘सर्वोच्च’ न्यायकर्ता को न्याय दे दिया। 9 नवंबर 2019 को 134 साल से चली आ रही लड़ाई में अंतिम फैसले की घड़ी आ गई।
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9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल को श्री राम जन्मभूमि के रूप में मान्यता दी और 2.77 एकड़ भूमि को रामलला का माना। साथ ही निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधि शामिल हो। इसके अलावा यह भी आदेश दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के विकल्प के तौर पर उपयुक्त स्थान पर 5 एकड़ जमीन मुहैया कराए।
2020 में शुरू हुआ मंदिर निर्माण
इसके साथ ही दशकों से चली आ रही लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हो गया। अब बारी थी निर्माण की। 5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की। ठीक छह महीने बाद 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी गई, जिसमें पीएम मोदी शामिल हुए।
2024 में भव्य मंदिर में विराजे रामलला
134 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कई चरणों में अभी भी जारी है। राम जन्मभूमि पर मंदिर के पहले चरण का काम पूरा होने के बाद रामलला को उसमें स्थापित किया गया। 22 जनवरी 2024 वह ऐतिहासिक तारीख थी जब मंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा हुई। 23 जनवरी से मंदिर को आम लोगों के लिए खोल दिया गया।
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