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श्रीराम मंदिर के धर्म-ध्वज पर कोविदार वृक्ष की आकृति का क्या पौराणिक इतिहास और महत्व जानिए
Kovidar Flag: अयोध्या के राम मंदिर में भक्ति, आस्था, उत्साह के साथ ‘कोविदार ध्वज’ फहराया गया। जो सनातन संस्कृति की हजारों वर्षों की प्राचीन परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
- Written By: सीमा कुमारी

क्या है कोविदर पेड़ की कहानी (सौ. सोशल मीडिया)
Ayodhya Ram Mandir Kovidar Flag: अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण संपन्न हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम जन्मभूमि मंदिर का दर्शन करके ध्वज फहराया। राम मंदिर के शिखर पर फहराए गए ध्वज पर सूर्य और ‘ॐ’ के साथ कोविदार वृक्ष का प्रतीक चिन्ह भी अंकित है।
अगर बात कोविदार वृक्ष की करें तो, अयोध्या की शक्ति एवं संप्रभुता का प्रतीक कोविदार का वृक्ष। बदलते दौर के लंबे प्रवाह में ध्वज और ध्वज पर अंकित कोविदार दोनों का महत्व विलुप्त होता चला गया। अब इस राजवृक्ष को राम मंदिर अयोध्या के प्रांगण में संरक्षित किया जा रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं क्या है कोविदर पेड़ की कहानी
क्या है कोविदर पेड़ की कहानी
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कोविदार वृक्ष एक अत्यंत प्राचीन और पौराणिक महत्व वाला वृक्ष है, जिसका संबंध विशेष रूप से अयोध्या के रघुवंश और भगवान राम की विरासत से है। बताया जाता है कि, कोविदार वृक्ष प्राचीन अयोध्या का राजचिह्न था। रघुवंश के राजाओं (सूर्यवंशी) के ध्वज पर सदियों से यह वृक्ष अंकित होता आया है।
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दुनिया का पहला हाइब्रिड प्लांट है कोविदार वृक्ष
अयोध्या कांड के 84वें सर्ग में और कालीदास के ऋतुसंहार 36.3 में भी कोविदार का उल्लेख है। जानकार बताते हैं कि पुराणों में कहानी मिलती है कि कोविदार साधारण वृक्ष नहीं है। इस वृक्ष को कश्यप ऋषि ने पारिजात के वृक्ष में मंदार का सार मिलाकर तैयार किया था। इसे गंगा के किनारे के क्षेत्र के लोगों ने सबसे पहले उगाना शुरू किया।
इस तरह कोविदार वृक्ष दुनिया के पहले हाइब्रिड प्लांट के रूप में सामने आता है। कोविदार के पुष्प में मंदार के बैंगनी रंग की आभा मिलती है। साथ ही, जिस प्रकार इस वृक्ष को अयोध्या ने अपनाया, उससे रघुकुल के वैज्ञानिक बोध का भी पता चलता है।
त्रेतायुग में अयोध्या का राजचिन्ह था कोविदार वृक्ष
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जब भरत जी भगवान राम को वनवास से वापस लाने के लिए अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे थे, तब लक्ष्मण जी ने दूर से ही उनके रथ पर फहरते ‘कोविदार’ वृक्ष वाले ध्वज को देखकर पहचान लिया था कि यह अयोध्या की सेना है।
ऐसा माना जाता है कि कोविदार वृक्ष रघुवंश के तप, त्याग और मर्यादा के उच्च आदर्शों का प्रतीक है। पौराणिक कथा कुछ पौराणिक कथाओं और शोधों के अनुसार, कोविदार को विश्व का पहला ‘हाइब्रिड’ वृक्ष माना जाता है।
मान्यता है कि महर्षि कश्यप ने इस वृक्ष को पारिजात और मंदार (ये दोनों भी दिव्य/पौराणिक वृक्ष हैं) के गुणों को मिलाकर तैयार किया था। कोविदार वृक्ष सिर्फ एक पेड़ नहीं है, बल्कि यह अयोध्या की प्राचीन राज-परंपरा, रघुवंश के गौरव, और रामराज्य की गरिमा का एक शक्तिशाली और पवित्र प्रतीक है।
आयुर्वेद में कोविदार वृक्ष को औषधि माना गया है
आयुर्वेद में कोविदार वृक्ष को (या कचनार) आयुर्वेद में भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी फूल, पत्तियां और छाल कई रोगों के उपचार में औषधि के रूप में उपयोग की जाती हैं। कोविदार वृक्ष को वैज्ञानिक रूप से (बाउहिनिया परप्यूरिया) या इससे मिलती-जुलती प्रजातियों के रूप में पहचाना जाता है। इसे सामान्य भाषा में कचनार या उससे मिलता-जुलता वृक्ष माना जाता है।
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यह बैंगनी या हल्के गुलाबी रंग के सुंदर फूलों के लिए जाना जाता है। ध्वज में मौजूद ऊँ और सूर्य का महत्व डिजाइन के चारों ओर ‘ॐ’ है, जिसे हिंदू परंपरा में हमेशा रहने वाली आदिम ध्वनि माना जाता है।
What is the story of the kovidar tree
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