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सियासत-ए-बिहार: सांसदी छोड़ी-पार्टी तोड़ी…तब जाकर मिली CM की कुर्सी, लेकिन 50 दिन में गिर गई सरकार
- Written By: अभिषेक सिंह
Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर हमारी स्पेशल सरीज सियासत-ए-बिहार की इस कड़ी में कहानी उस मुख्यमंत्री की, जिसने अपने अनूठे कार्यों से अनगिनत कीर्तिमान स्थापित किए।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बीपी मंडल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Siyasat-E-Bihar: बिहार में विधानसभा चुनाव की जमीन पर सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। राजनैतिक दलों और सियासतदानों के बीच शह और मात के खेल को लेकर रणनीतियां तैयार की जा रही हैं। लोकतंत्र के इस महायज्ञ में हम भी अपने हिस्से की आहुति लेकर हाजिर हैं। बिहार चुनाव को लेकर हमारी स्पेशल सरीज सियासत-ए-बिहार की इस कड़ी में कहानी उस मुख्यमंत्री की, जिसने अपने अनूठे कार्यों से अनगिनत कीर्तिमान स्थापित किए।
यह पहली बार था जब किसी समाजवादी नेता ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी ही पार्टी को तोड़कर मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया। यह पहली बार था जब किसी मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार में तीन साधु-संतों को मंत्री बनाया। यह पहली बार था जब किसी मुख्यमंत्री ने एक सेवारत पत्रकार को मंत्री बना दिया, जो न तो विधायक था और न ही एमएलसी। ऐसे ही अनोखे मुख्यमंत्री थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, जिन्हें बीपी मंडल के नाम से भी जाना जाता है। जो कि मंडल आयोग के अध्यक्ष भी थे।
3 साधुओं व पत्रकार को बनाया मंत्री
महंत सुखदेव गिरि को कैबिनेट मंत्री नियुक्त किया गया। वे मुजफ्फरपुर के बरुराज से जन क्रांति दल के विधायक चुने गए। वे राजपूत जाति से थे। महंत रामकिशोर दास को भी कैबिनेट मंत्री नियुक्त किया गया। वे मुजफ्फरपुर के मीनापुर से जन क्रांति दल के विधायक थे। वे भूमिहार जाति से थे। स्वामी विवेकानंद को उप-मंत्री नियुक्त किया गया। वे मुंगेर के सिकंदरा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे। वे दलित समुदाय से थे।
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इसी तरह बीपी मंडल ने पटना स्थित अंग्रेजी अख़बार सर्चलाइट के सहायक संपादक शंभूनाथ झा को मंत्री बनाकर सबको चौंका दिया। यह तब हुआ जब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बीपी मंडल ने ऐसा क्यों किया? 1967 में जब महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बन रही थी।
कहां से शुरू हुई यह सियासी कहानी?
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के सांसद बीपी मंडल बिहार सरकार में मंत्री बनने की जिद पर अड़े थे। राम मनोहर लोहिया का मानना था कि किसी सांसद के राज्य सरकार में मंत्री बनने से जनता में नकारात्मक संदेश जाएगा। ऐसे में कांग्रेस और गैर-कांग्रेसी दलों में क्या फर्क रह जाएगा? बहरहाल, बीपी मंडल अपनी ज़िद के चलते महामाया की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बन गए। चूंकि वे न तो विधायक थे और न ही विधान पार्षद। इसलिए उनके लिए छह महीने के भीतर बिहार विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी था।
बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (सोर्स- सोशल मीडिया)
तीन-चार महीने बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर मंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर दिल्ली आकर संसद चुनाव लड़ने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस बीच, बीपी मंडल लगातार मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा पर विधान परिषद में शामिल होने की अनुमति देने के लिए दबाव बना रहे थे। विधायक या एमएलसी के रूप में उनका कार्यकाल 4 सितंबर 1967 को समाप्त हो रहा था। तब तक यह स्पष्ट हो गया था कि महामाया सरकार उन्हें बिहार विधानसभा में नहीं भेजेगी।
SSP बगावत करके बनाया नया गुट
इसके बाद उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) से बगावत कर दी और एक नया गुट बना लिया। जब मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल समाप्त हो गया, तो राज्यपाल ने मुख्यमंत्री की सलाह पर उनसे इस्तीफा मांग लिया। अंततः बीपी मंडल ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बीपी मंडल ने महामाया सरकार को गिराने के लिए जोड़-तोड़ शुरू कर दी। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के विधायकों को तोड़कर शोषित पार्टी का गठन किया।
कांग्रेस पार्टी ने लगाया मौके पर चौका
उस समय दलबदल विरोधी कानून नहीं था, इसलिए पार्टी के भीतर तोड़फोड़ आम बात थी। कांग्रेस सत्ता खो चुकी थी, इसलिए वह भी महामाया सरकार को गिराने की साज़िश रच रही थी। गठबंधन सरकार के भीतर गुटों की आपसी कलह ने कांग्रेस के मिशन को आसान बना दिया। बीपी मंडल के रूप में कांग्रेस को महामाया सरकार गिराने का एक मोहरा मिल गया। कांग्रेस ने बीपी मंडल को समर्थन और सहयोग प्रदान किया। बीपी मंडल ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (सपा) से अलग होकर शोषित दल (समाजवादी मोर्चा) का गठन किया।
यह भी पढ़ें: सियासत-ए-बिहार: नीतीश का वो प्रण…जिसने जिताया बिहार का रण, 58 साल पहले देखा था CM बनने का ख्वाब
उन्होंने कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए, तो वे महामाया सरकार गिरा सकते हैं। मंडल के प्रस्ताव पर कांग्रेस के भीतर मतभेद था। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता विनोदानंद झा ने कहा कि यह प्रस्ताव कांग्रेस के लिए आत्मघाती होगा। जनता अवसरवाद को माफ नहीं करेगी। वरिष्ठ कांग्रेस सांसद द्वारिका नाथ तिवारी ने कहा कि यह गठबंधन घोर अवसरवादी होगा। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने का आग्रह किया।
इंदिरा ने बीपी मंडल के दिया संकेत
उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उनके लिए विपक्षी दल की सरकार का गिरना ज़्यादा महत्वपूर्ण था। उन्होंने बिहार कांग्रेस को बी.पी. मंडल का साथ देने का मौन संकेत दिया। 25 जनवरी, 1968 को कांग्रेस और शोषित दल ने विधानसभा में महामाया सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। महामाया सरकार गिर गई। बी.पी. मंडल ने महामाया सरकार गिरा दी ताकि वे मुख्यमंत्री बन सकें। हालांकि, वे बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे।
इंदिरा गांधी के साथ बीपी मंडल (सोर्स- सोशल मीडिया)
राज्यपाल उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं कर सके। कुछ ही महीने पहले विधायक न बनने के कारण उन्हें अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा था। तब, बी.पी. मंडल ने विधान परिषद में प्रवेश के लिए एक अनोखी रणनीति बनाई। उन्होंने कांग्रेस से बातचीत की। फिर बी.पी. मंडल ने अपने एक विश्वस्त विधायक, सतीश प्रसाद सिंह को कार्यवाहक मुख्यमंत्री नियुक्त करने की पहल की ताकि उन्हें विधान परिषद में मनोनीत किया जा सके।
4 दिन के लिए CM बने सतीश प्रसाद
28 जनवरी 1968 को कांग्रेस नेता महेश प्रसाद सिन्हा और शोषित दल के बी.पी. मंडल ने सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के समक्ष सतीश प्रसाद सिंह का नाम प्रस्तुत किया। उसी दिन सतीश प्रसाद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस प्रकार बिहार को पिछड़ी जाति का पहला मुख्यमंत्री मिला। वे परवत्ता से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे, जो अब शोषित दल में शामिल हो गए थे। 30 जनवरी को शोषित दल के दो और विधायकों शत्रुदमन शाही और एन.ई. होरो ने मंत्री पद की शपथ ली।
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सतीश प्रसाद सिंह अब विधान परिषद में बी.पी. मंडल की सीट सुरक्षित करने के लिए ज़िम्मेदार थे। हालांकि, उस समय परिषद में कोई रिक्त स्थान नहीं था। पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री के.बी. सहाय मंडल के रक्षक बनकर उभरे। के.बी. सहाय के एक रिश्तेदार परमानंद परिषद के मनोनीत सदस्य थे। उन्होंने सहाय के अनुरोध पर इस्तीफा दे दिया। अब सतीश प्रसाद सिंह के लिए अवसर था। 29 जनवरी 1968 को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री की सलाह पर विधान परिषद की रिक्त सीट पर बी.पी. मंडल को मनोनीत किया।
बीपी मंडल बन गए बिहार के मुखिया
बी.पी. मंडल अब विधान पार्षद बन गए थे, जिससे उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। राजनीतिक समझौते के अनुसार, सतीश प्रसाद सिंह ने 1 फ़रवरी 1968 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उसी दिन नई सरकार का गठन हुआ। बी.पी. मंडल मुख्यमंत्री बने। उनके साथ 29 अन्य मंत्रियों ने शपथ ली। बी.पी. मंडल की सरकार दलबदलुओं से भरी हुई थी। सरकार बनाने और चलाने के लिए कई समझौते करने पड़े। मुख्यमंत्री सहित ग्यारह विधायक समाजवादी पार्टी (सपा) से दलबदल कर आए थे।
सिर्फ 50 दिन ही चल सकी सरकार
जन क्रांति दल (जेकेडी) के नौ विधायक बागी थे। महंत सुखदेव गिरि और महंत रामकिशोर दास जन क्रांति दल से बगावत करके बी.पी. मंडल में शामिल हो गए थे, इसलिए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। समाजवादी पार्टी (सपा) के बागी स्वामी विवेकानंद को राज्य मंत्री बनाया गया। बी.पी. मंडल सर्चलाइट के सहायक संपादक शंभूनाथ झा के मित्र थे, जिसके कारण वे मंत्री बने। शंभूनाथ झा को विधि एवं जनसंपर्क मंत्री नियुक्त किया गया। लेकिन इन सब प्रयासों के बावजूद बी.पी. मंडल की सरकार केवल 50 दिन ही चल सकी।
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