Postpartum Depression: डिलीवरी के बाद क्यों होती है माएं PPD का शिकार, ऐसे रखें अपनी मेंटल हेल्थ का ध्यान
PostPartum Depression In Mothers: जितना जरूरी नवजात बच्चे का हेल्दी रहना है, उतना ही जरूरी नई मां का खुश रहना भी है। इससे मां के मेंटल हेल्थ और उनके रिश्ते पर बुरा असर पड़ता है।
- Written By: रीता राय सागर
पोस्टपार्टम डिप्रेशन (सौ. पिंटरेस्ट)
PostPartum Depression in New MoM: नवजात शिशु के जन्म के पहले से ही घर में खुशनुमा माहौल होता है। बच्चे का जन्म परिवार में खुशी लाता है, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद सारा ध्यान और देखभाल मां से ज्यादा बच्चे की ओर शिफ्ट हो जाता है।
पहली बार मां बनी महिला को ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनके लिए हर चीज नई होती है और सब कुछ मैनेज करने के दौरान वो कब डिप्रेशन का शिकार हो जाती है, उन्हें पता भी नहीं चलता है। हर कपल के लिए माता-पिता बनना आसान नहीं होता। ज्यादातर महिलाओं को डिलीवरी के बाद भावनाओं में उतार-चढ़ाव, उदासी और चिंता का सताने लगती है। यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण होते है, इसे समझना और समय पर इस समस्या का समाधान करना बेहद जरूरी होता है।
क्या कहता है WHO
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में विस्तार से जानकारी साझा करते हुए बताया कि अपनी दुनिया में खोए रहने वाले इंसान के लिए अचानक माता-पिता बन जाना कोई आसान बात नहीं होती है। बच्चे के जन्म के बाद प्यार, खुशी, उत्साह के साथ-साथ निराशा और घबराहट होना सामान्य बात है, लेकिन यदि यह निगेटिव इमोशन लंबे समय तक बनी रहे, तो कई और समस्याओं को जन्म दे सकती है। जब इससे डेली लाइफ प्रभावित होने लगे तो प्रॉब्लम हो सकती है।
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कब होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन
हांलाकि इसकी कोई निर्धारित समय सीमा नहीं है। यह पेरेंटिंग के किसी भी दौर में हो सकता है। पर आमतौर पर यह बच्चे के जन्म के दो से आठ हफ्तों के बाद शुरू होता है। इसमें मां का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है और बच्चे की देखभाल में भी बाधा डाल सकता है।
इस मामले में ज्यादातर इसका पता काफी देर से चलता है। भारतीय परिवेश में इस समस्या को एडमिट करना ही बड़ी बात है। घर के बड़ों को लगता है, यह मामूली बात है। जबकि यह एक गंभीर समस्या होती है।
क्या होते हैं पोस्पार्टम डिप्रेशन के लक्षण
पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) के लक्षणों की बात करें तो इसमें लगातार उदासी या खालीपन महसूस होता है। कई बार बहुत रोने का मन होता है। बच्चे के साथ इमोशनल कनेक्शन नहीं बन पाता है। बच्चे के लालन-पालन को लेकर खुद पर सवाल उठने लगते हैं। नींद न आना, थकान, ऊर्जा की कमी और फोकस न कर पाना, खाने की आदतों में बदलाव जैसे लक्षण होते है। यह अवस्था तब खतरनाक हो जाती है, जब खुद या बच्चे को नुकसान पहुंचाने का विचार आने लगे।
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क्या है इसका निवारण
इस परिस्थिति में परिवार का सपोर्ट बेहद जरूरी होता है। प्रसव के बाद से मां का शरीर कमजोर होता है। उनके शरीर में कई तरह के हॉर्मोनल बदलाव होते है। इसके लिए परिवार में सबसे पहले सपोर्ट सिस्टम बनाएं- परिवार, पति, दोस्तों और अनुभवी लोगों से बात करें। इन सबसे बात न बनें, तो डॉक्टर, मनोचिकित्सक या काउंसलर से मदद लें। जरूरत पड़ने पर दवा भी ली जा सकती है। इसके साथ ही आराम और सेहत का ख्याल रखना मददगार साबित हो सकता है। पौष्टिक भोजन, व्यायाम और छोटी-छोटी नींद लें।
