
Bollywood Actors in Indian Army (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Republic Day Special: गणतंत्र दिवस केवल परेड और झंडा फहराने का औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उन वीर जवानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिन्होंने देश की संप्रभुता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भारतीय सिनेमा ने हमेशा से पर्दे पर सैनिकों की शौर्यगाथाओं को जीवंत किया है, लेकिन बॉलीवुड में कुछ ऐसे सितारे भी हैं जिनका सेना से नाता सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहा। इन कलाकारों ने असल जिंदगी में भी देश की सरहदों की रक्षा की है और वर्दी की गरिमा को निभाया है।
26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ, तब से यह दिन हर भारतीय के लिए गौरव का प्रतीक बन गया। आज जब हम गणतंत्र दिवस 2026 मना रहे हैं, तो उन ‘रियल लाइफ हीरोज’ को याद करना जरूरी है जिन्होंने कैमरे के सामने आने से पहले बंदूक थामकर राष्ट्रसेवा की शपथ ली थी।
दमदार आवाज के मालिक नाना पाटेकर ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना में सक्रिय योगदान दिया था। उन्हें मानद कैप्टन का दर्जा मिला और वे द्रास जैसे दुर्गम क्षेत्रों में तैनात रहे। बाद में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक से भी नवाजा गया। वहीं, ‘महाभारत’ में शकुनि मामा के रूप में मशहूर हुए गुफी पेंटल ने अभिनय से पहले 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सीमा पर एक जवान के रूप में देश की सेवा की थी।
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दिवंगत अभिनेता बिक्रमजीत कंवरपाल भारतीय सेना से मेजर के पद से रिटायर हुए थे। साल 2002 में सेना छोड़ने के बाद उन्होंने ‘2 स्टेट्स’ और ‘पवित्र रिश्ता’ जैसे प्रोजेक्ट्स में अपनी प्रतिभा दिखाई। इसी तरह, ‘3 इडियट्स’ के मशहूर प्रोफेसर अच्युत पोद्दार भारतीय सेना में कप्तान रह चुके थे। उन्होंने 1962 से 1967 तक देश की सेवा की और फिर अभिनय की दुनिया में 125 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। रुद्राशीष मजूमदार (रिटायर्ड मेजर) ने भी सात साल सेना में बिताने के बाद ‘छिछोरे’ और ‘जर्सी’ जैसी फिल्मों से पहचान बनाई।
‘महाभारत’ के भीम यानी प्रवीण कुमार सोबती ने बीएसएफ (BSF) में डिप्टी कमांडेंट के पद पर सेवा दी थी। वे एक एथलीट भी थे जिन्होंने एशियन गेम्स में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। क्लासिक सिनेमा के अभिनेता रहमान ने 1940 के दशक में रॉयल इंडियन एयर फोर्स में पायलट के रूप में प्रशिक्षण लिया था। इन सभी सितारों ने यह साबित किया कि देश के प्रति प्रेम केवल संवादों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह उनके कर्मों में भी झलकता है।






