नालंदा विधानसभा सीट: JDU का 'अभेद्य किला', हाई-प्रोफाइल सीट पर राजनीतिक इतिहास और विकास की टकराहट

Bihar Assembly Elections 2025: यह सीट JDU के नेता श्रवण कुमार का गढ़ है, जिन्होंने यहां लगातार 7 बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस का कभी दबदबा था, लेकिन 1985 के बाद से JDU ने इस पर कब्जा बना रखा है।
Nalanda Assembly seat: JDU's 'impregnable fortress', political history and development collide in this high-profile seat
नालंदा विधानसभा सीट, (कॉन्सेप्ट फोटो)
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Nalanda Assembly Seat Profile: बिहार विधानसभा की 243 सीटों में नालंदा विधानसभा सीट को एक अत्यंत हाई-प्रोफाइल सीट माना जाता है। इस सीट का सीधा संबंध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से है, जिनका यहां गहरा राजनीतिक प्रभाव है। यह सीट नालंदा जिले के नूरसराय और बेन प्रखंड क्षेत्र से मिलकर बनी है, जिसमें सिलाव, बिहारशरीफ और राजगीर प्रखंड के कुछ गांव भी शामिल हैं।

यह विधानसभा क्षेत्र जनता दल यूनाइटेड (JDU) का 'अभेद्य किला' माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जदयू के दिग्गज नेता श्रवण कुमार यहां से लगातार 7 बार चुनाव जीत चुके हैं। इस बार उनकी चुनौती इस रिकॉर्ड को बरकरार रखते हुए लगातार आठवीं बार जीत दर्ज करना है।

कांग्रेस का गढ़, फिर JDU का कब्जा

नालंदा विधानसभा का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। एक समय था जब यहां कांग्रेस का दबदबा था। कांग्रेस के प्रभुत्व वाले इलाके में कांग्रेस नेता श्याम सुंदर सिंह ने तीन बार नालंदा से विधायक के तौर पर जीत हासिल की थी। फिर बदलाव का दौर आया और 1985 के बाद कांग्रेस को यहाँ कोई सफलता नहीं मिली, और उसके बाद से ही जदयू ने इस सीट पर अपना कब्जा जमाए रखा है। दिलचस्प रूप से देखा जाए तो राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी इस सीट पर कभी जीत हासिल नहीं कर पाई हैं, जो श्रवण कुमार और जदयू के मजबूत जनाधार को दर्शाता है। नालंदा विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक संरचना 1977 में स्थापित हुई थी, जब यह पटना जिले से अलग होकर नालंदा जिला बना था। इस क्षेत्र में जातीय राजनीति और नीतीश कुमार के प्रभाव से चुनावी समीकरणों का निर्धारण होता है।

कुर्मी-पासवान-यादव का मिश्रण

नालंदा विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यहाँ के प्रमुख मतदाता समुदाय इस प्रकार हैं। कुर्मी, पासवान और यादव जाति के वोटरों की संख्या अधिक है। इनके अलावा, राजपूत, कोइरी और भूमिहार जाति के वोटरों की भी महत्वपूर्ण संख्या है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। इस बार चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता है, क्योंकि भले ही श्रवण कुमार का दबदबा हो, लेकिन अन्य दलों के उम्मीदवारों को इन जातीय समीकरणों को साधकर ही अपने चुनावी अभियान को आकार देना होगा।

नालंदा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर

नालंदा विधानसभा क्षेत्र सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र भारतीय पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा उदाहरण पेश करता है। यहां स्थित प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। साथ ही जिले में स्थित चंडी-मौ गांव, खंडहर और नालंदा म्यूजियम भारतीय पुरातात्विक धरोहर का अद्वितीय उदाहरण पेश करते हैं। यहाँ के ऐतिहासिक स्थल जैसे ब्लैक बुद्धा, जुआफरडीह स्तूप और रुक्मिणी स्थान भी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

विश्व प्रसिद्ध 'सिलाव खाजा'

नालंदा जिले के सिलाव में बनने वाला खाजा दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस स्वादिष्ट मिठाई ने इस क्षेत्र की पहचान में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है और अक्सर यह राजनीतिक चर्चाओं और मेहमानवाजी का हिस्सा भी बनता है। इस बार का चुनाव यह तय करेगा कि क्या मुख्यमंत्री के अभेद्य किले को कोई चुनौती दे पाता है या श्रवण कुमार अपने रिकॉर्ड को बरकरार रखते हुए नालंदा में जदयू का झंडा लहराते हैं।

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