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ट्रंप के ‘गाजा पीस बोर्ड’ को बड़ा झटका! चीन, ब्रिटेन और फ्रांस ने मोड़ा मुंह, भारत का क्या है स्टैंड?
Gaza Peace Board: डोनाल्ड ट्रंप के गाजा पीस बोर्ड से यूएन के तीन वीटो पावर देशों चीन, फ्रांस और ब्रिटेन ने दूरी बना ली है। भारत इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
- Written By: अमन उपाध्याय

ब्रिटेन और फ्रांस ने ट्रंप के प्लान से बनाई दूरी, कॉन्सेप्ट फोटो
Donald Trump Gaza Peace Board News: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में शांति बहाली और पुनर्निर्माण के लिए गठित ‘गाजा पीस बोर्ड’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) में वीटो पावर रखने वाले तीन प्रमुख देशों चीन, ब्रिटेन और फ्रांस ने इस बोर्ड से खुद को अलग कर लिया है।
ट्रंप ने इस बोर्ड के जरिए 58 देशों को न्योता भेजा था लेकिन दुनिया की महाशक्तियों का इस तरह पीछे हटना ट्रंप की कूटनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
चीन, ब्रिटेन और फ्रांस ने क्यों बनाई दूरी?
चीन ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और ‘सच्चे बहुपक्षवाद’ का पालन करता है। चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, वे यूएन चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं।
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वहीं, ब्रिटेन ने बोर्ड में रूस को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई है। ब्रिटेन का तर्क है कि जो देश खुद युद्ध लड़ रहा है वह शांति का दूत कैसे हो सकता है? फ्रांस ने भी नीतिगत मामलों का हवाला देते हुए इस बोर्ड का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।
भारत और रूस का रुख
भारत ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है लेकिन सरकार इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 30-31 जनवरी को अरब देशों के विदेश मंत्रियों के साथ होने वाली बैठक में भारत इस पर राय-मशवरा कर सकता है। दूसरी ओर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक शर्त रखी है। उनका कहना है कि अगर यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस को कुछ रियायतें दी जाती हैं तभी वे इस बोर्ड में शामिल होने पर विचार करेंगे।
ट्रंप का ‘एकाधिकार’ बना बड़ी बाधा
विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार, कई बड़े देशों के दूरी बनाने के पीछे मुख्य कारण इस बोर्ड की संरचना है। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के मुताबिक, गाजा पीस बोर्ड में सभी अधिकार डोनाल्ड ट्रंप के पास सुरक्षित हैं और उनके पास ही वीटो पावर है। अन्य सदस्य केवल अपनी राय दे सकते हैं। इतना ही नहीं, ट्रंप इस बोर्ड के आजीवन अध्यक्ष रहेंगे।
यह भी पढ़ें:- ‘इतना तो अमेरिका दे सकता है’, पुतिन ने ट्रंप को बताई ग्रीनलैंड की कीमत; यूरोप के जख्मों पर छिड़का नमक
आर्थिक मोर्चे पर भी शर्तें काफी कड़ी हैं स्थाई सदस्य बनने के लिए देशों से 1 अरब डॉलर की मांग की गई है। यह भी कहा जा रहा है कि ट्रंप ने इस बोर्ड के लिए संयुक्त राष्ट्र की सहमति नहीं ली जो यूएन के अस्तित्व के लिए एक चुनौती साबित हो सकता है।
पाकिस्तान में आंतरिक कलह
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस बोर्ड में शामिल होने का फैसला किया है, लेकिन देश के भीतर ही इसका विरोध शुरू हो गया है। पूर्व गृह मंत्री फजल-उर रहमान ने इसे ‘पाप’ करार देते हुए कहा है कि जहां नेतन्याहू हों वहां न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।
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