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चीन से लौटते ही ट्रंप के डेलीगेशन ने कचरे में फेंके फोन और लैपटॉप, क्यों राष्ट्रपति के खेमे में मचा हड़कंप?
- Written By: अमन उपाध्याय
US Cybersecurity Espionage: डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के बाद अमेरिकी डेलिगेशन ने जासूसी के डर से अपने फोन और लैपटॉप फेंक दिए। साइबर सुरक्षा के चलते सुरक्षा एजेंसियों ने यह कड़ा कदम उठाया।

सांकेतिक एआई फोटो
US Cybersecurity Espionage From China: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 13 से 15 मई 2026 तक चली इस राजकीय यात्रा को दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों को स्थिर करने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन यात्रा समाप्त होते ही एक ऐसी दिलचस्प और हैरान कर देने वाली घटना सामने आई जिसने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हलकों में हलचल मचा दी है।
रिपोर्टों के अनुसार, चीन से वापस लौटते ही अमेरिकी डेलिगेशन के सदस्यों ने अपने मोबाइल फोन, लैपटॉप और यहां तक कि एक्रेडिटेशन कार्ड्स को भी कचरे के डिब्बे में फेंक दिया।
क्यों उठाया गया ऐसा कदम?
अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों द्वारा उठाया गया यह कदम सीधे तौर पर चीन द्वारा की जाने वाली संभावित जासूसी की आशंका से जुड़ा है। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का गहरा डर था कि चीन की यात्रा के दौरान इन उपकरणों में गुप्त रूप से जासूसी सॉफ्टवेयर या मैलवेयर प्लांट किए गए हो सकते हैं।
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यदि इन उपकरणों को वापस अमेरिकी नेटवर्क से जोड़ा जाता, तो वे भविष्य में संवेदनशील सरकारी जानकारी चुराने का जरिया बन सकते थे। यही कारण है कि सुरक्षा एजेंसियों ने डेलिगेशन के सभी सदस्यों को चीन में इस्तेमाल किए गए सामानों को फेंकने का निर्देश दिया।
क्लीन डिवाइस का इस्तेमाल
जानकारी के अनुसार, चीन जाने से पहले ही अमेरिकी डेलीगेशन के लिए सुरक्षा के बेहद सख्त इंतजाम किए गए थे। डेलिगेशन के सदस्य अपने मूल फोन और लैपटॉप अमेरिका में ही सुरक्षित छोड़कर गए थे। इसके बजाय, उन्हें चीन में उपयोग के लिए विशेष रूप से तैयार ‘टेंपररी’ या ‘क्लीन डिवाइस’ दिए गए थे। ये उपकरण अस्थाई लैपटॉप और नियंत्रित संचार प्रणालियों से लैस थे। जिन्हें जासूसी, हैकिंग या अवैध डेटा संग्रह के जोखिम को कम करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया था।
तकनीकी चुनौतियों का सामना
इन कड़े सुरक्षा उपायों के कारण डेलिगेशन को काफी ‘सिरदर्दी’ और तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सामान्य संदेश जो आमतौर पर एन्क्रिप्टेड ऐप्स या सिंक किए गए डिवाइस के जरिए तुरंत पहुंच जाते हैं, उन्हें भेजने के लिए नियंत्रित चैनलों और अस्थायी खातों का सहारा लेना पड़ा।
कई बार गोपनीय संदेशों को व्यक्तिगत रूप से पहुंचाना पड़ा ताकि डिजिटल हैकिंग की किसी भी संभावना को शून्य किया जा सके। अमेरिकी अधिकारी चीन को साइबर सुरक्षा के लिहाज से एक जोखिम भरा देश मानते हैं, इसलिए वहां किसी भी Digital Footprint को छोड़ना खतरनाक माना जाता है।
ट्रंप और शी जिनपिंग के क्या है मायने?
लगभग 9 साल के लंबे समय के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा थी। इस तीन दिवसीय राजकीय दौरे के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। दोनों शीर्ष नेताओं के बीच व्यापारिक समझौतों, टैरिफ, ताइवान के मुद्दे, ईरान युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी बड़ी वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा हुई। इस यात्रा में ट्रंप के साथ अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के सीईओ भी शामिल थे, जिनमें एलन मस्क प्रमुख थे। हालांकि यह यात्रा मूल रूप से मार्च में होनी थी, लेकिन ईरान संकट के कारण इसे मई में पूरा किया गया।
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