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सरकार बदली पर हालात नहीं! अमेरिकी ‘लोकतंत्र’ बना कई देशों में तबाही का सबब
अमेरिका ने पिछले 70 वर्षों में लोकतंत्र की सुरक्षा के नाम पर कई देशों में सरकारों को उखाड़ फेंका है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि इन देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों में कमी आई है।
- Written By: अमन उपाध्याय

अमेरिकी 'लोकतंत्र' बना कई देशों में तबाही का सबब, फोटो ( सो.सोशल मीडिया)
नई दिल्ली: अमेरिका ने पिछले 70 वर्षों में लोकतंत्र की सुरक्षा के नाम पर दुनियाभर में कई देशों की सरकारों को उखाड़ फेंका है। हालांकि, आंकड़े यह दर्शाते हैं कि जिन देशों में सत्ता परिवर्तन किया गया, वहां लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय और भी कमजोर हुआ है। लोकतांत्रिक सिद्धांतों जैसे कानून का शासन, नागरिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, 1950 के बाद से अमेरिका ने दुनिया भर में कम से कम 37 बार सफलतापूर्वक सरकारों को बदला है। यदि असफल प्रयासों को भी शामिल किया जाए, तो यह संख्या और भी अधिक होगी। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 41% मामलों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को ही हटाया गया।
अमेरिका को सुरक्षा का खतरा बताया
19वीं और 20वीं सदी के आरंभ में अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों के मामलों में दखल दिया। अमेरिका ने इसका कारण यूरोपीय ताकतों के हस्तक्षेप को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया, लेकिन वास्तव में उसका मकसद अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित करना था। बाद में, 1947 में राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने ग्रीस और तुर्की को सहायता प्रदान करते हुए घोषणा की कि अमेरिका का लक्ष्य उन सभी लोगों की सहायता करना है जो बाहरी दबाव का सामना कर रहे हैं।
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1965 के बाद अमेरिका द्वारा सत्ता परिवर्तन कराए गए 21 देशों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि इन देशों की आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। सत्ता बदलने से पहले इन देशों की औसत विकास दर 2.41% थी, जो बाद में बढ़कर 3.08% हो गई। हालांकि, इनमें से 11 देशों (यानी आधे से अधिक) में विकास दर फिर से गिरावट की ओर मुड़ गई। इसका मुख्य कारण यह था कि सत्ता परिवर्तन से पहले ही अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा इन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध, दबाव और धमकियों का असर पड़ चुका था, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर हो गई थी।
आर्थिक विकास की रफ्तार तेज़
सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने प्रभावित देशों में निवेश, व्यापार और सहायता बढ़ा दी। इससे कई देशों में शुरुआती दौर में आर्थिक विकास की रफ्तार तेज़ दिखाई दी। हालांकि, यह विकास ज्यादा समय तक टिक नहीं सका। कई जगहों पर राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और अराजकता के चलते आर्थिक स्थिति फिर से बिगड़ने लगी।
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कानून व्यवस्था और संप्रभुता पर असर
अमेरिकी हस्तक्षेप के पांच वर्षों के भीतर अधिकतर देशों में लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, कानून का शासन और स्वायत्तता कमजोर पड़ गई। 34 में से 21 देशों में कानून का शासन प्रभावित हुआ, जबकि 28 में से 16 देशों में स्वायत्तता में गिरावट आई।
कई उदाहरणों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया। जैसे 2003 में अमेरिका ने इराक पर आक्रमण के बाद वहां की प्रमुख सरकारी संस्थाओं को भंग कर दिया। इसी तरह, 1973 में चिली में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद संसद को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। हालांकि, कुछ देशों में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाया गया, लेकिन इसके साथ ही लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर होता चला गया।
Regime change no relief us democracy caused destruction worldwide
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