इंडोनेशिया की सेना, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
Indonesia Gaza Peacekeeping Force: इंडोनेशिया ने गाजा में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय शांति सेना के लिए अपने 8,000 सैनिकों की टुकड़ी को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण प्लान की दिशा में किसी देश द्वारा की गई पहली ठोस प्रतिबद्धता है। इंडोनेशिया, जो संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति मिशनों में दुनिया के शीर्ष 10 योगदानकर्ताओं में से एक है अब ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का हिस्सा बनने की तैयारी में है।
राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के इस फैसले को लेकर इंडोनेशिया में काफी नाराजगी और संदेह देखा जा रहा है। आलोचकों का मानना है कि जकार्ता केवल अमेरिका के साथ एक व्यापार सौदे की बातचीत के चलते ट्रंप के एजेंडे के आगे झुक रहा है।
जकार्ता के एक विशेषज्ञ मोहम्मद जुल्फिकार राखमत के अनुसार, जनता को डर है कि कहीं उनके सैनिकों का इस्तेमाल अनजाने में इजरायली सेना की मदद करने या गलत पक्षों के खिलाफ लड़ने के लिए न किया जाए। शुक्रवार को जकार्ता में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शनकारियों ने “फ्री ग़ज़ा” के नारों के साथ इस भागीदारी का विरोध किया।
इंडोनेशिया की इस भागीदारी पर आर्थिक सवाल भी उठ रहे हैं। ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ में स्थायी जगह पाने के लिए इंडोनेशिया को लगभग 1 बिलियन डॉलर (करीब 8400 करोड़ रुपये) का भुगतान करना पड़ सकता है। इसके अलावा, चूंकि यह मिशन संयुक्त राष्ट्र के दायरे से बाहर काम करेगा इसलिए इसके बजट और सैनिकों के इस्तेमाल को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। वर्तमान योजना के अनुसार, यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल (ISF) गाजा में फिलिस्तीनी पुलिस बलों की सहायता करेगा और सीमा सुरक्षा में मदद करेगा।
तमाम विरोधों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इंडोनेशिया इस मिशन के लिए एक ‘ईमानदार मध्यस्थ’ साबित हो सकता है। दुनिया का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश होने के नाते इसकी एक धार्मिक पहचान है लेकिन साथ ही यह इजरायल के लिए कोई रणनीतिक खतरा पैदा नहीं करता है। हालांकि इंडोनेशिया के इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं लेकिन उसने तुर्की या ईरान की तरह कभी सीधा टकराव वाला रुख नहीं अपनाया है।
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इंडोनेशियाई सेना के प्रमुख जनरल मारुली सिमंजुंतक ने पुष्टि की है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल यूनिट्स का प्रशिक्षण शुरू हो चुका है। शुरुआत में 20,000 सैनिकों का वादा किया गया था, जिसे अब घटाकर 5,000 से 8,000 के बीच कर दिया गया है। राष्ट्रपति प्रबोवो अगले सप्ताह वाशिंगटन में होने वाली ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में शामिल हो सकते हैं जहां अन्य देशों द्वारा भी सैनिकों की घोषणा किए जाने की उम्मीद है।