ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' वाला दांव, क्या संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने की है गुप्त तैयारी? जानें पूरी योजना

Board of Peace: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' पहल शुरू की है, जिसमें भारत सहित 60 देशों को न्योता दिया गया है। विशेषज्ञ इसे संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक नया मंच मान रहे हैं।
Trump's 'Board of Peace' gambit: Is this a secret plan to dismantle the United Nations? Learn about the full plan.
डोनाल्ड ट्रंप, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
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Donald Trump Board of Peace: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक संघर्षों को सुलझाने के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' नामक एक नई पहल की घोषणा की है। जहां ट्रंप इसे शांति का मंच बता रहे हैं वहीं, अंतरराष्ट्रीय राजनयिक इसे संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर करने और एक नया 'ट्रंप-स्टाइल' ग्लोबल सिस्टम बनाने की कोशिश मान रहे हैं।

क्या है ट्रंप की 'बोर्ड ऑफ पीस' योजना?

डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के करीब 60 देशों को एक नई पहल 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का न्योता दिया है। प्राप्त जानकारी और ड्राफ्ट चार्टर के अनुसार, यह बोर्ड सबसे पहले गाजा संघर्ष के समाधान और वहां के पुनर्निर्माण पर काम करेगा। इसके बाद धीरे-धीरे दुनिया के अन्य संघर्षों तक इसका दायरा बढ़ाया जाएगा। ट्रंप ने हाल ही में गाजा के प्रशासन के लिए 'नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा' बनाने का भी ऐलान किया है जिसकी निगरानी और फंडिंग का जिम्मा इसी बोर्ड के पास होगा।

'पैसा दो, सदस्यता लो' मॉडल

इस बोर्ड की संरचना को लेकर राजनयिक हलकों में काफी चर्चा है। इस बोर्ड की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप खुद जीवनभर इस बोर्ड के अध्यक्ष रहेंगे। सदस्य देशों का कार्यकाल सामान्य तौर पर तीन साल का होगा। हालांकि, ट्रंप ने एक विशेष प्रावधान रखा है यदि कोई देश एक अरब डॉलर (करीब 8,000 करोड़ रुपये) का योगदान देता है तो उसे बोर्ड में स्थायी सदस्यता मिल सकती है। व्हाइट हाउस का तर्क है कि यह उन देशों को स्थायी भागीदारी देने के लिए है जो शांति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाते हैं।

भारत समेत किन देशों को मिला न्योता?

ट्रंप ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया है। अब तक हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने बिना किसी हिचक के इस पहल को स्वीकार कर लिया है और इसे एक 'सम्मानजनक निमंत्रण' बताया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने भी अपना योगदान देने की इच्छा जताई है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे केवल गाजा के संदर्भ में बात कर रही थीं या पूरी योजना के लिए। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी गाजा के लिए इस बोर्ड को सैद्धांतिक मंजूरी दी है।

संयुक्त राष्ट्र के लिए चुनौती और विवाद

राजनयिकों का मानना है कि यह पहल सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र की वैधता को चुनौती देती है। एक यूरोपीय राजनयिक ने तो इसे 'ट्रंप यूनाइटेड नेशंस' करार दिया है, जो यूएन चार्टर की बुनियादी सोच को नजरअंदाज करता है। ट्रंप लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के आलोचक रहे हैं; उनका तर्क है कि ये संस्थाएं महंगी, अप्रभावी और अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं। विशेष रूप से, अमेरिका पर संयुक्त राष्ट्र का करीब 1.5 अरब डॉलर बकाया भी है।

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस बोर्ड की आलोचना करते हुए इसे 'औपनिवेशिक सोच' बताया है। उनकी आलोचना का एक मुख्य कारण यह भी है कि गाजा की निगरानी के लिए बने इस बोर्ड में फिलहाल किसी भी फिलिस्तीनी को शामिल नहीं किया गया है।

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