
प्रोजेक्ट आइसवर्म ग्रीनलैंड, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
US Secret Nuclear Mission In Greenland: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए अपना पूरा जोर लगा रहे हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा खरीदने की चाहत है, या इसके पीछे बर्फ में दफन कोई गहरा राज है? ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों के नीचे छिपा ‘कैंप सेंचुरी’ कभी दुनिया का सबसे रहस्यमय सैन्य ठिकाना था जिसे आज ‘ऑपरेशन आइसवर्म’ के नाम से जाना जाता है।
यह कहानी मई 1959 में शुरू हुई, जब अमेरिकी सेना के अधिकारियों ने ग्रीनलैंड की अनंत बर्फ के नीचे एक मिलिट्री बेस बनाने की योजना तैयार की। दुनिया को बताया गया कि यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एक ‘आर्कटिक रिसर्च सेंटर’ है, जहां वैज्ञानिक बर्फीले मौसम का अध्ययन करेंगे। लेकिन हकीकत में यह शीत युद्ध का एक गुप्त मिशन था।
इसका असली उद्देश्य बर्फ के नीचे 52 हजार वर्ग मील में सुरंगों का एक जाल बिछाना था, जिसमें परमाणु मिसाइलें छिपाई जा सकें। इन मिसाइलों को रेल की पटरियों पर इधर-उधर घुमाया जाना था ताकि सोवियत संघ को इनकी सही लोकेशन का पता न चले।
अमेरिका ने ग्रीनलैंड को इसलिए चुना क्योंकि यह सोवियत संघ के करीब था और इसकी मोटी बर्फ एक प्राकृतिक ढाल का काम कर रही थी। सुरंगों के भीतर बिजली, पानी और सैनिकों के रहने का पूरा इंतजाम था, जिसे चलाने के लिए एक छोटा परमाणु रिएक्टर भी लगाया गया था। हालांकि, छह साल के भीतर ही इस प्रोजेक्ट को समेटना पड़ा।
वैज्ञानिकों ने माना था कि बर्फ स्थिर रहेगी, लेकिन ग्लेशियर धीरे-धीरे खिसकने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि सुरंगें दबने लगीं, दीवारें टेढ़ी हो गईं और मिसाइल की पटरियां टूटने लगीं। परमाणु रिएक्टर से रेडिएशन का खतरा और डेनमार्क के साथ कूटनीतिक तनाव के डर ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
इस गुप्त मिशन का सच दुनिया के सामने 1997 में आया जब डेनमार्क की संसद ने जांच शुरू की। सरकारी दस्तावेजों से पता चला कि अमेरिका ने रिसर्च के नाम पर डेनमार्क को धोखे में रखकर वहां परमाणु सैन्य योजना बनाई थी।
आज डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को फिर से चर्चा में ले आए हैं। अब कारण परमाणु मिशन नहीं बल्कि बदलती दुनिया की जरूरतें हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ ने नए समुद्री व्यापारिक रास्ते खोल दिए हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स, तेल और गैस का भंडार है, जो भविष्य की तकनीक और सेना के लिए अनिवार्य है।
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अमेरिका को डर है कि अगर वह पीछे रहा, तो रूस और चीन इस रणनीतिक द्वीप पर कब्जा कर लेंगे, जिससे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। यहां पहले से मौजूद थुले एयर बेस मिसाइल चेतावनी और स्पेस निगरानी के लिए आज भी अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है।






