
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
West Bengal elephant conservation success: पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में स्थित वन अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के लिए एक सुखद खबर सामने आई है। वन विभाग और रेलवे के समन्वित प्रयासों तथा आधुनिक घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS) के प्रभावी क्रियान्वयन से पिछले दो वर्षों में रेल पटरियों को पार करते समय एक भी हाथी की मौत नहीं हुई है। यह उपलब्धि वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है।
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह सफलता रेलवे और वन विभाग के बीच वास्तविक समय (Real-time) में सूचनाओं के आदान-प्रदान के कारण संभव हुई है। रेलवे नियंत्रण कक्षों में तैनात वन अधिकारी हाथियों की आवाजाही पर निरंतर नज़र रखते हैं। जैसे ही हाथियों का झुंड पटरियों के करीब आता है, लोको पायलटों को तुरंत सूचित किया जाता है और चिह्नित गलियारों में ट्रेनों की गति पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया जाता है।
हाथियों की सुरक्षा में घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS) ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस प्रणाली के तहत लगाए गए हाई-टेक कैमरे अंधेरे, घने कोहरे या भारी बारिश में भी 700 से 750 मीटर की दूरी तक हाथियों की मौजूदगी का पता लगा सकते हैं। मुख्य रूप से 52 किलोमीटर लंबे मदारीहाट-नागराकाटा खंड और बुक्सा बाघ अभयारण्य पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है, जहाँ पहले दुर्घटनाओं का खतरा सर्वाधिक रहता था।
यह भी पढ़ें:- अकोला मनपा में MIM की तटस्थता पर सियासी घमासान, भाजपा ने सत्ता समीकरण साधकर जीत पक्की की
यदि अतीत पर नज़र डालें, तो स्थिति काफी चिंताजनक थी। साल 2004 से 2013 के बीच इस क्षेत्र में रेलगाड़ियों की चपेट में आने से 50 से अधिक हाथियों की जान गई थी। वहीं, 2013 से 2023 के बीच भी करीब 30 हाथी दुर्घटना का शिकार हुए। हालांकि, पिछले दो वर्षों में अपनाई गई कड़ी निगरानी और आईडीएस तकनीक ने इस खूनी सिलसिले को रोक दिया है।
वर्तमान में जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान, गोरुमारा और बुक्सा बाघ अभयारण्य जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही अब पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो गई है। यह मॉडल अब देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन रहा है जहाँ रेल पटरियां वन्यजीव गलियारों से होकर गुजरती हैं।






