Nagpur: नारा पार्क आरक्षण मामले पर भड़के प्रदर्शनकारी, सरकार पर बिल्डर को लाभ देने का लगाया आरोप

Dr. Ambedkar National Park Reservation: नागपुर के नारा में 130 एकड़ पर प्रस्तावित आंबेडकर राष्ट्रीय उद्यान पर सरकार का फैसला लंबित, प्रदर्शनकारियों ने बिल्डर के हस्तक्षेप पर जताया विरोध।
Dr. Ambedkar National Park Reservation: नागपुर के नारा में 130 एकड़ पर प्रस्तावित आंबेडकर राष्ट्रीय उद्यान पर सरकार का फैसला लंबित, प्रदर्शनकारियों ने बिल्डर के हस्तक्षेप पर जताया विरोध।
नागपुर न्यूज
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Nagpur News: नारा में 130 एकड़ में फैले डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय उद्यान को लेकर सरकार का रुख असंवेदनशील है, जिस पर 400 दिनों से अधिक समय से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। यदि पार्क बनना ही नहीं था, तो गरीब किसानों की जमीन पार्क के लिए आरक्षित क्यों की गई? बार-बार निवेदन और अनुरोधों के बावजूद सरकार द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से बिल्डर को जमीन सौंपने तथा लाभ पहुंचाने का प्रयास होने का आरोप पूर्व पार्षद वेदप्रकाश आर्य ने पत्र परिषद में लगाया।

तत्कालीन प्रन्यास ट्रस्टी विधायकों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्य ने कहा कि अगर संविधान निर्माता के प्रति इतना स्नेह है, तो सरकार को सर्वोच्च न्यायालय जाकर पार्क के लिए जमीन आरक्षित करने का फैसला लेना चाहिए। इस जमीन पर पार्क बनने की जन भावना है।

1996 से ही चल रहा आरक्षण

उन्होंने कहा कि यह समुदाय की पहचान का मुद्दा है। 1996 में तत्कालीन म्हाडा अध्यक्ष सुनील शिंदे ने सबसे पहले इस भूमि पर एक मिल बनाने की योजना बनाई थी। हालांकि बाद में पता चला कि यह भूमि एक पार्क के लिए आरक्षित थी। फिर 2003 में प्रन्यास के सभापति रहे मनुकुमार श्रीवास्तव ने निविदा जारी की। इसमें प्रन्यास, अन्य संगठनों और अन्य विकासकर्ताओं ने पार्क बनाने पर सहमति जताई। उस समय भूमि हस्तांतरण के लिए 20.52 करोड़ रुपये की निधि की आवश्यकता थी। इसमें से प्रन्यास ने इस भूमि के लिए कलेक्टर कार्यालय में भूमि अधिग्रहण अधिकारी के पास 5.3 करोड़ रुपये जमा किए। हालांकि भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने इस पर कोई तत्परता नहीं दिखाई।

भूमि मालिकों ने बेच दी जमीन

आर्य ने आरोप लगाया कि उस समय भी बिल्डर लॉबी सक्रिय थी। तब से सरकार ने इस भूमि के प्रति उदासीनता दिखाई है। इस बीच भूमि अधिग्रहण न होने के कारण भूमि मालिकों ने जमीन बेच दी। वर्तमान में बिल्डर के पास 130 एकड़ में से 50-60 एकड़ जमीन है। बिल्डर जल्द ही शेष जमीन भी खरीद लेगा।

आर्य ने आरोप लगाया कि एक बिल्डर ने 2022 में यह जमीन खरीदी थी। इस मामले में मध्यस्थता करने और आरक्षित भूमि को बरकरार रखते हुए पार्क के निर्माण पर जोर देने के लिए अदालत में एक आवेदन दायर किया गया था। एडवोकेट आनंद परचुरे ने बिना रुपया लिए अंत तक अपना पक्ष रखा।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि प्रन्यास ने सुनवाई के दौरान नए वकीलों को मैदान में उतारकर बिल्डर से सुनियोजित तरीके से जमीन छीनने की कोशिश की। पत्र परिषद में अधि। हंसराज भांगे, सुनील मेश्राम, अधि. प्रताप गोस्वामी, शेखर पाटिल, संघमित्रा रामटेके आदि उपस्थित थे।

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