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लेफ्ट ने कांग्रेस और TMC ने साफ किया वामपंथ, बंगाल में कैसे बदलती रही सत्ता, BJP दोहरा पाएगी इतिहास?
Bengal Assembly Elections: बंगाल में चुनावी माहौल के बीच हर कोई यहां की राजनीति को समझने और समझाने के प्रयास में जुटा हुआ है। यही वजह है कि हम भी आपके लिए यह कहानी लेकर हाजिर हुए हैं।
- Written By: अभिषेक सिंह

कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में चुनावी संग्राम का औपचारिक शंखनाद होने में अभी समय है, लेकिन सियासी दलों और सियासतदानों ने अनौपचारिक बिगुल फूंक दिया है। पश्चिम बंगाल की सियासत से जुड़ी चर्चाएं अब चौक-चौपालों और चाय की दुकानों पर चुस्कियों के साथ चकल्लस करने लगी हैं। हर कोई यहां की राजनीति को समझने और समझाने के प्रयास में जुटा हुआ है। यही वजह है कि हम भी आपके लिए यह कहानी लेकर हाजिर हुए हैं।
तारीख थी 20 मार्च 1972….कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। बंगाल कांग्रेस की विदाई हुई और मुख्य धारा की कांग्रेस पार्टी को राज्य संभालने का मौका मिला। वैसे तो सिद्धार्थ शंकर 30 अप्रैल 1977 तक मुख्यमंत्री रहे लेकिन यह 5 साल 41 दिनों का कार्यकाल कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल में आखिरी कार्यकाल रहा। हमारी कहानी की शुरुआत यहीं से होती है…
1977 में सत्ता से बेदखल हो गई कांग्रेस पार्टी
जब 1977 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस मजह 20 सीटों पर सिमट गई, जबकि लेफ्ट फ्रंट को 230 से ज्यादा सीटें मिलीं। लेफ्ट फ्रंट का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) कर रही थी। इंदिरा गांधी के इमरजेंसी शासन के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा था। पश्चिम बंगाल में यह गुस्सा और भी ज्यादा था क्योंकि मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार पर कम्युनिस्टों और नक्सलियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित हिंसा के गंभीर आरोप लगे थे।
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34 साल तक बंगाल में रहा वामपंथी शासन
कांग्रेस पार्टी पर 1972 के चुनावों में धांधली का भी आरोप लगा था। कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाज़ी, अनुशासनहीनता और दल-बदल इतने ज्यादा थे कि आम जनता निराश हो गई। जिसका नतीजा यह हुआ कि लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया और 1977 से 2011 तक लगातार 34 सालों तक बंगाल को लेफ्ट का गढ़ बना दिया। लेफ्ट सरकार ने भूमि सुधार, पंचायती राज और ग्रामीण विकास को बढ़ावा दिया और राज्य में अजेय बनी रही। हालांकि, 2000 के दशक में लेफ्ट ने कुछ गलतियां कीं, जिससे 2011 तक लोगों का भरोसा कम हो गया।
2011 में ममता ने लेफ्ट को उखाड़ फेंका
पश्चिम बंगाल में साल 2011 का साल एक क्रांति जैसा था। ममता बनर्जी ने 34 सालों से बंगाल की सत्ता पर जमे हुए लेफ्ट फ्रंट को उखाड़ फेंका। उन्होंने ऐसा इस तरह से किया कि लेफ्ट अब हाशिए पर है और अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। इसके नतीजे सिर्फ लेफ्ट के लिए ही बुरे नहीं थे। लेफ्ट फ्रंट के साथ ही साथ ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी को भी हाशिए पर धकेल दिया, जिस पार्टी से वह खुद आई थीं।
1977 से 2011 तक बंगाल में रहा लेफ्ट
तीन दशकों तक दुनिया में कहीं भी कोई लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार नहीं थी। पश्चिम बंगाल एक अपवाद था, जहां कम्युनिस्ट 1977 से 2011 तक सत्ता में रहे। 2011 में ममता बनर्जी ने लेफ्ट फ्रंट सरकार को इतनी निर्णायक रूप से हराया कि अब पश्चिम बंगाल में सभी लेफ्ट पार्टियां हाशिए पर हैं। टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटें जीतीं, जबकि लेफ्ट फ्रंट सिर्फ 62 सीटों पर सिमट गया। 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन को 227 सीटें जीतकर सरकार बनाई।
ज्योति बसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य (सोर्स- सोशल मीडिया)
अपने 34 साल के शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में सिर्फ़ दो मुख्यमंत्री थे। ज्योति बसु और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य। ज्योति बसु ने 1977, 1982, 1987 और 1996 के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद लगातार मुख्यमंत्री के रूप में काम किया। उन्होंने 23 साल और 138 दिनों तक यह पद संभाला। इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने साल 2000 में पद संभाला। उनके नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने 2001 और 2006 का चुनाव जीता। भट्टाचार्य ने उन्होंने 10 साल और 195 दिनों तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया।
1 जनवरी 1998 को ममता ने बनाई TMC
34 साल के शासन में सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी हो सत्ता विरोधी भावना पैदा होना तय है। ममता बनर्जी एक प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में उभरीं। 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस बनाई। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन जारी रखा। 2011 के चुनावों के लिए भी गठबंधन था। लेफ्ट फ्रंट जनता के मूड को समझने में नाकाम रहा और ममता बनर्जी ने इसका फायदा उठाया। दो आंदोलनों के कारण आखिरकार पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बाहर होना पड़ा।
सिंगूर आंदोलन: पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से अस्थिर दौर से गुज़र रहा था। जहां देश के दूसरे हिस्सों में औद्योगीकरण अपने चरम पर था, वहीं लेफ्ट सरकार पर भी दबाव बढ़ रहा था। बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने भी औद्योगीकरण की नीति अपनाई। हुगली जिले के सिंगूर में, ‘नैनो’ कार फैक्ट्री के लिए टाटा मोटर्स को 997 एकड़ जमीन दी गई। सरकार ने दावा किया कि इस नीति से रोजगार और विकास को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, ज़्यादातर किसानों ने अपनी जमीन देने से मना कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जमीन उपजाऊ है और मुआवजे की रकम नाकाफी।
मां-माटी-मानुष का आधार बनीं ममता बनर्जी
ममता बनर्जी ने सिंगूर आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने इसे “मां, माटी, मानुष” के लिए संघर्ष बताया। पश्चिम बंगाल में विरोध प्रदर्शनों, रैलियों और हड़तालों का सिलसिला चला। यह आंदोलन जिसकी शुरुआत महिलाओं ने की थी, पुलिस के साथ झड़पों में बदल गया। ममता बनर्जी 2006 में 25 दिन की भूख हड़ताल पर बैठ गईं। उन्हें बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला। 2008 तक विरोध प्रदर्शन इतने तेज हो गए कि टाटा ने सिंगूर से प्रोजेक्ट वापस ले लिया। बाद में इस प्रोजेक्ट को गुजरात में शिफ्ट कर दिया गया। तब तक लेफ्ट सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा चरम पर पहुंच चुका था।
नंदीग्राम आंदोलन: 2007 में पूर्वी मेदिनीपुर जिले में एक आंदोलन शुरू हुआ। लेफ्ट सरकार जमीन अधिग्रहण को लेकर निशाने पर थी। एक केमिकल हब और स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए लगभग 14,000 एकड़ उपजाऊ ज़मीन हासिल करने के लिए इंडोनेशियाई सलीम ग्रुप कंपनी के साथ एक डील हुई थी। सरकार ने दावा किया कि इससे उद्योग आकर्षित होंगे और नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन किसान अपनी ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं थे।
ममता के आंदोलन में शामिल हुए माओवादी
आमतौर पर लेफ्ट जैसी समझ रखने वाले माओवादी भी लेफ्ट सरकार के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गए। कांग्रेस, टीएमसी और जमात-ए-उलेमा-ए-हिंद ने भी विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। किसानों ने सड़कें खोद दीं और सरकारी अधिकारियों के लिए रास्ता बंद कर दिया। 14 मार्च 2007 को पुलिस गांवों में घुसी और गोलीबारी की। जिसमें आधिकारिक तौर पर 14 लोग मारे गए। कई लोग घायल हुए। बलात्कार और हिंसा की भी खबरें आईं। इस घटना ने ममता बनर्जी की सरकार की नींव रखी।
पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
ममता बनर्जी ने दोनों आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई। वह लोकप्रिय आंदोलनों की नेता बन गईं और उनकी पार्टी का विस्तार हुआ। ममता बनर्जी ने आने वाले विधानसभा चुनावों में 226 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया और कांग्रेस पार्टी को 60 से ज़्यादा सीटें दीं। आंदोलनों में ममता बनर्जी की सक्रिय भागीदारी का फायदा मिला। 2011 में वह सत्ता में आईं। उन्होंने किसानों को 400 एकड़ जमीन वापस करने के लिए एक कानून पास किया। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण को अवैध घोषित कर दिया और जमीन वापस करने का आदेश दिया। सिंगूर के किसान ममता बनर्जी से खुश थे।
- विचारधारा की जंग, जनविरोधी छवि: वामदल अपनी मूल पहचान यानी किसान, दलित और वंचितों की राजनीति से भटक गए। उन्होंने ग्रामीण और गरीब वर्ग के मुद्दों को छोड़ दिया, जिससे उनकी छवि जनविरोधी बन गई। लेफ्ट ने विकासवादी रुख अपनाने की कोशिश की, लेकिन यह बदलाव जनता को पसंद नहीं आया और वे विचारधारा की जंग हार गए।
- ‘मां, माटी, मानुष’ का सफल नैरेटिव: ममता बनर्जी ने ‘मां, माटी, मानुष’ का सफल नारा देकर लेफ्ट की राजनीति को ध्वस्त किया। उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी जमीन तैयार की और लेफ्ट के खिलाफ आक्रामकता दिखाई। इससे लेफ्ट का पारंपरिक वोट बैंक छिना और जनता ने उन्हें किसान विरोधी मानते हुए ममता को अपना विकल्प चुन लिया।
- भ्रष्टाचार और पार्टी की अफसरशाही: लेफ्ट सरकार में पार्टी और प्रशासन के बीच फर्क मिट गया था। आंतरिक अफसरशाही हावी हो गई और भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी माना कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा था। सीपीएम कैडरों की गुंडागर्दी और हिंसा ने पार्टी की छवि को धूमिल कर दिया, जिसकी सजा जनता ने दी।
- सीपीएम कैडर राज के खिलाफ गुस्सा: ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि 34 साल के शासन में सीपीएम का ‘कैडर राज’ हर जगह हावी था। पुलिस थानों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक, बिना पार्टी की मर्जी के कोई काम नहीं होता था। इस दमघोंटू व्यवस्था और हर जगह पार्टी के नियंत्रण ने आम जनता के मन में गहरा गुस्सा भर दिया था।
- एकजुट विपक्ष की कारगर रणनीति: कांग्रेस और तृणमूल के साथ आने से विपक्ष को मजबूती मिली। 2009 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट की करारी हार के बाद ममता ने जनता का मिजाज भांप लिया। उन्होंने बिखरे विपक्ष को एकजुट किया और ‘मां, माटी, मानुष’ के साथ अल्पसंख्यक समीकरण साधकर सत्ता परिवर्तन की मजबूत नींव रख दी।
- ममता बनर्जी का ‘दीदी’ के रूप में उदय: ममता ने अपनी छवि ‘दीदी’ के रूप में गढ़ी और गरीबों के मुद्दों को उठाया। औद्योगीकरण के खिलाफ उनका रुख और साफ-सुथरी छवि ने जनता का भरोसा जीता। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर जनता में व्याप्त असंतोष को ममता ने बखूबी भुनाया, जिससे लेफ्ट कमजोर हुआ और टीएमसी मजबूत हुई।
- मुस्लिम वोट बैंक का ध्रुवीकरण: बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी रणनीतिक तौर पर अहम है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि लेफ्ट राज में मुसलमानों की हालत खराब थी। इसका फायदा टीएमसी को मिला। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में मुस्लिम वोट बैंक लेफ्ट से छिटककर पूरी तरह ममता बनर्जी की ओर शिफ्ट हो गया।
किस तरह अर्श से फर्श पर पहुंच गया लेफ्ट?
पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों का समर्थन लगातार कम हो रहा है। 2009 से 2024 तक लोकसभा चुनाव और 2011 से 2021 तक राज्य विधानसभा चुनावों में लेफ्ट का प्रदर्शन लगातार खराब होता गया है। 2009 के चुनावों में लेफ्ट को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन ने 19 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को सिर्फ 1 सीट मिली। 2014 में मोदी लहर के बावजूद यहां टीएमसी 34 सीटें जीतने में कामयाब हुई, जबकि भाजपा को 2 और कांग्रेस को 4 सीटें हासिल हुईं। इस बार लेफ्ट 2 सीटों पर सिमटकर रह गई।
यह भी पढ़ें: 1977 में गई सत्ता…2021 में ‘आर्यभट्ट’ बनी कांग्रेस, बंगाल में लड़ाई से पहले हथियार डाल बैठे राहुल?
2019 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी का गढ़ हिल गया। उन्होंने 22 सीटें जीतीं जबकि भाजपा को 18 सीटें मिलीं। लेफ्ट शून्य सीटों पर सिमट गई। हालांकि 2024 में टीएमसी ने फिर अपनी स्थिति मजबूत करते हुए 28 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 12 और कांग्रेस को एक सीट मिली। लेफ्ट इस बार भी शून्य पर ही रही। राज्य विधानसभा चुनावों के आंकड़े भी उत्साहजनक नहीं हैं। 2011 में टीएमसी ने 184 सीटें जीतीं और जबकि लेफ्ट 62 सीटों पर सिमट गई। 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं और भाजपा को 32 सीटें मिलीं। इसके साथ ही लेफ्ट की सीटों की संख्या और कम हो गई। 2021 में टीएमसी ने 213 सीटें जीतीं लेकिन भाजपा दोगुने से ज्यादा छलांग लगाते हुए 70 सीटों पर पहुंच गई।
BJP कर पाएगी लेफ्ट और TMC जैसा खेल?
जिस तरह से पश्चिम बंगाल में लेफ्ट ने कांग्रेस और ममता बनर्जी ने लेफ्ट का सफाया किया, ठीक उसी तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी भी टीएमसी का सफाया करने की ओर देख रही है। पिछले चुनाव में 70 सीटें जीतने के बाद से उसका उत्साह भी बढ़ा हुआ है। हालांकि इस उत्साह को 2024 में हल्का सा झटका जरूर लगा था। लेकिन बीजेपी उसके बाद से और अक्रामक हो गई है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस चुनाव में वह ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने का सपना सच कर पाती है या नहीं?
Frequently Asked Questions
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Que: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस सत्ता से कब बेदखल हुई?
Ans: पश्चिम बंगाल में साल 1977 के चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा, इसके बाद यहां लेफ्ट सत्ता में आई थी।
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Que: लेफ्ट की 34 साल के शासन में बंगाल में कितने मुख्यमंत्री बने?
Ans: पश्चिम बंगाल में 34 साल के वामपंथी शासन में दो मुख्यमंत्री हुए। 1977 से 2000 तक ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे, इसके बाद 2000 से 2011 तक बुद्धदेव भट्टाचार्य यहां के सीएम रहे।
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Que: पश्चिम बंगाल में इस बार सरकार बना पाएगी भाजपा?
Ans: पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं। इस सवाल का सबसे सही जवाब चुनाव के नतीजों के बाद ही मिल पाएगा।
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