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1977 में गई सत्ता…2021 में ‘आर्यभट्ट’ बनी कांग्रेस, बंगाल में लड़ाई से पहले हथियार डाल बैठे राहुल?
- Written By: अभिषेक सिंह
West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में बदतर हालत में पहुंच चुकी कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे हुए बैठी है। न तो प्रदेश स्तरीय नेता उतने एक्टिव नजर आ रहे हैं और न ही दिल्ली से दबिश दी जा रही है...

कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Bengal Assembly Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अभी करीब पांच महीने बाकी हैं, लेकिन साल के 365 दिन और दिन के 24 घंटे चुनावी मोड में रहने वाली भारतीय जनता पार्टी जो बंगाल में ‘सियासी महाभारत’ का अनौपचारिक ऐलान कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी दो हफ्ते पहले बंगाल बंगाल पहुंचे थे। इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी दो दिन बंगाल में बिताए। प्रदेश स्तर पर पार्टी पहले से ही सक्रिय है।
दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में बदतर हालत में पहुंच चुकी कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे हुए बैठी है। न तो प्रदेश स्तरीय नेता उतने एक्टिव नजर आ रहे हैं और न ही दिल्ली से दबिश दी जा रही है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी जंग से पहले ही राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी ने हथियार डाल दिए हैं। इसके पीछे क्या वजहें है…चलिए जानने की कोशिश करते हैं…
1977 में गंवाई पश्चिम बंगाल की सत्ता
साल 1977 में पश्चिम बंगाल में सत्ता खो देने वाली कांग्रेस पार्टी अपनी तैयारी के कोई संकेत नहीं दिखा रही है। केंद्र में सत्ता में लौटने का सपना देखने वाली कांग्रेस पश्चिम बंगाल में व्यावहारिक रूप से गायब हो गई है। इसके बावजूद भाजपा की तुलना में कांग्रेस की तैयारी बहुत कमजोर स्थिति में है। लंबे समय तक पश्चिम बंगाल पर शासन करने वाली कांग्रेस ने पिछले 10 चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन किया है। लगातार पार्टी का ग्राफ गिरा है और अब शून्य के करीब पहुंच गई है।
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2021 में नहीं खुला कांग्रेस का खाता
2021 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही। 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने केवल एक लोकसभा सीट जीती। इसका मतलब है कि विधानसभा और लोकसभा दोनों में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व शून्य की ओर बढ़ रहा है। पार्टी जिस तरह का रवैया दिखा रही है उससे इस बार चुनाव में बी खाता खुल पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है। जिसको लेकर पार्टी के अंदर ही नेता दबी आवाज में सवाल उठा रहे हैं।
कांग्रेस के आगे असली दिक्कत क्या?
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस भ्रम की स्थिति में दिख रही है। कभी-कभी INDIA गठबंधन के तहत कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनावों के लिए तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की कोशिश करती है और दूसरी बार वह उनके खिलाफ चुनाव लड़ती है। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं पर असर पड़ा है और उनका मनोबल कम है। सितंबर 2024 में शुभंकर सरकार को पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने अधीर रंजन चौधरी की जगह ली, जो तृणमूल कांग्रेस के कड़े आलोचक रहे हैं।
गठबंधन पर अधीर-शुभंकर दो राय
शुभंकर सरकार के पास न तो जन अपील है और न ही उन्हें मजबूत जनाधार वाला नेता माना जाता है। हालांकि, कांग्रेस में लंबे समय से रहने के कारण वह राज्य के कार्यकर्ताओं के बीच जाने-पहचाने हैं। शुभंकर ने संगठन में विभिन्न भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन अभी तक विधायक या सांसद नहीं बने हैं। कहा जाता है कि जहां अधीर रंजन चौधरी तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी भी गठबंधन के खिलाफ थे वहीं शुभंकर इसके पक्ष में थे।
अधीर रंजन चौधरी व शुभंकर सरकार (सोर्स- सोशल मीडिया)
भाजपा के खिलाफ लड़ी रही कांग्रेस
पश्चिम बंगाल कांग्रेस की रणनीति अभी भी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बजाय विपक्षी बीजेपी से लड़ने पर ज़्यादा केंद्रित दिख रही है। हाल ही में जब अमित शाह पश्चिम बंगाल आए थे, तो पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते देखा गया था। उससे कुछ दिन पहले, जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस से मिला, तो चर्चा बंगाल के अंदर के मुद्दों के बजाय बीजेपी शासित राज्यों में बंगालियों के खिलाफ हुई घटनाओं पर केंद्रित थी।
लेफ्ट के साथ या अकेले लड़ेगी कांग्रेस
कुछ अलग-थलग मुद्दों को छोड़कर पश्चिम बंगाल कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस की तुलना में केंद्र सरकार की बीजेपी के प्रति ज़्यादा आक्रामक दिख रही है। कुछ दिन पहले राज्य इकाई ने केंद्रीय कांग्रेस नेतृत्व को बताया कि वह पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ना चाहती है। राज्य कांग्रेस का मानना है कि अगर लेफ्ट के साथ गठबंधन होता भी है तो सीटों का बंटवारा 50-50 होना चाहिए न कि पहले वाला 2:1 का अनुपात। इसका मतलब है कि चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं, लेकिन कांग्रेस ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह अकेले चुनाव लड़ेगी या लेफ्ट के साथ गठबंधन में।
फुल चुनावी मोड में चल रही बीजेपी
दूसरी ओर बीजेपी जो 2021 में बंगाल में अपने शानदार प्रदर्शन के कारण मुख्य विपक्षी पार्टी बनी, उसने पहले ही अपना अभियान तेज़ कर दिया है। दिल्ली और बिहार में बड़ी सफलताओं के बाद बीजेपी का ध्यान अब बंगाल पर है। बीजेपी नेता न केवल ज़मीनी स्तर पर लोगों से जुड़ रहे हैं, बल्कि ममता बनर्जी को भी व्यवस्थित तरीके से चुनौती दे रहे हैं। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगातार अपने नेताओं को पश्चिम बंगाल भेज रहा है और बूथ स्तर से लेकर ज़िला स्तर तक तैयारियों की समीक्षा की जा रही है।
| लोकसभा चुनाव | सीटों की संख्या |
| 2024 | 1 |
| 2019 | 2 |
| 2014 | 4 |
| 2009 | 6 |
| 2004 | 6 |
2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से सिर्फ एक सीट जीत पाई। पार्टी के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी भी अपनी सीट हार गए। कांग्रेस का वोट शेयर घटकर सिर्फ 4.7 प्रतिशत रह गया। 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पूरे राज्य में अकेले चुनाव लड़ने में भी सक्षम नहीं थी। आखिरकार, कांग्रेस ने उन्हीं लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन किया, जिन्होंने कभी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। हालांकि, यह गठबंधन फायदेमंद साबित नहीं हुआ और कांग्रेस एक भी सीट जीतने में नाकाम रही।
| विधानसभा चुनाव | सीटों की संख्या |
| 2021 | 0 |
| 2016 | 44 |
| 2011 | 42 |
| 2006 | 21 |
| 2001 | 26 |
इस स्थिति से बीजेपी को बहुत फायदा हुआ, जो मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी। इस बीच कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर घटकर सिर्फ़ 3 प्रतिशत रह गया। 2021 की हार कांग्रेस के लिए खासकर अपमानजनक थी क्योंकि 2016 में पार्टी ने 44 सीटें जीती थीं, जो पिछले चार चुनावों में उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन था। 2021 में कांग्रेस 44 सीटों से शून्य पर आ गई। इससे पता चलता है कि पिछले चार दशकों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और फिर बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को पूरी तरह से खत्म कर दिया है और अब पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती है।
1977 में सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस
पश्चिम बंगाल के आखिरी कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे थे। उनका कार्यकाल 20 मार्च 1972 से 30 अप्रैल 1977 तक रहा। बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के उदय के साथ कांग्रेस धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ खोती गई। ज्योति बसु की सरकार के दौरान ममता बनर्जी कांग्रेस नेता थीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) को सीधे चुनौती देना चाहती थीं। लेकिन कांग्रेस फैसला नहीं कर पा रही थी। नतीजतन, ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस छोड़ दी और 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस बनाई।
यह भी पढ़ें: West Bengal: पहले PM मोदी से मुलाकात, अब ममता दीदी पर आरोप…अधीर रंजन चौधरी के समर्थन में उतरी BJP!
इससे कांग्रेस में फूट पड़ गई ममता बनर्जी के सभी समर्थक और लेफ्ट के विरोधी तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। ममता बनर्जी ने अपनी नई पार्टी के साथ सिर्फ 14 सालों में पश्चिम बंगाल से लेफ्ट को बाहर कर दिया, लेकिन सदियों पुरानी कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाने में नाकाम रही। सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने न केवल लेफ्ट को लगभग खत्म कर दिया, बल्कि कांग्रेस को भी पश्चिम बंगाल में फलने-फूलने से रोक दिया। इस बार भी ममता को चुनौती दे पाना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।
How congress went from ruling to zero seat in bengal did rahul gandhi surrender before election
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