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आजम का विकल्प या ओवैसी का इलाज? नसीमुद्दीन के आने से सपा में बदलेंगे समीकरण, UP की मुस्लिम सियासत में हलचल
- Written By: अभिषेक सिंह
UP Politics: बहुजन समाज पार्टी में नंबर दो का कद रखने वाले और बसपा सुप्रीमो मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब समाजवादी हो चुके हैं। लेकिन अखिलेश को इसका क्या फायदा होगा यह सबसे बड़ा सवाल है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी व अखिलेश यादव (सोर्स- सोशल मीडिया)
Samajwadi Party Politics: बहुजन समाज पार्टी में नंबर दो का कद रखने वाले और बसपा सुप्रीमो मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब समाजवादी हो चुके हैं। बसपा छोड़कर कांग्रेस में पहुंचने और वहां बुरी तरह नज़रअंदाज किए जाने के बाद वह अखिलेश यादव की मौजूदगी में अपने साथियों के साथ समाजवादी पार्टी में शामिल हुए।
बताया जा रहा है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी में अपनी एंट्री के लिए अखिलेश यादव के सामने कोई बड़ी शर्त नहीं रखी है, बल्कि खुद को पार्टी का एक वफादार नेता बताया है। लेकिन जानकारों का मानना है कि उनकी नजर राज्य में खाली होने वाली राज्यसभा सीटों पर है।
सिद्दीकी की एंट्री से SP को होगा फायदा?
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को उम्मीद है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ आने से उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं होगा ओवैसी या चंद्रशेखर आजाद जैसे फैक्टर कमजोर पड़ेंगे। समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट न मुस्लिम वोटबैंक में किसी तरह की सेंधमारी नहीं चाहती है।
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सपा को मिली ओवैसी की सियासी काट!
अखिलेश यादव का मकसद है कि मुस्लिम पॉलिटिक्स का कोई भी बड़ा चेहरा ऐसी उछलकूद न करे जिससे उसके वोटबैंक को नुकसान पहुंचे। इसके इतर नसीमुद्दीन की समाजवादी एंट्री को असदुद्दीन ओवैसी के यूपी में संभावित सियासी प्रवेश की काट के तौर पर भी देखा जा रहा है।
किस स्किल के लिए मशहूर है नसीमुद्दीन?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पार्टी में एंट्री को लेकर एक और बड़ी चर्चा उनकी मैनेजमेंट स्किल्स को लेकर है। BSP में रहने के दौरान उन्हें पार्टी का टॉप फंड मैनेजर माना जाता था। फंड जुटाने और रिसोर्स मैनेज करने में उनकी विशेषज्ञता चुनावों के दौरान सपा फायदेमंद साबित हो सकती है।
कैसे सियासी ऐसेट साबित होंगे सिद्दीकी?
2027 में यूपी विधानसभा चुनाव होने हैं। समाजवादी पार्टी को BJP से मुकाबला करने के लिए फंड की बहुत जरूरत है। ऐसे में अगर वह सपा के लिए फंड को अच्छे से मैनेज करते हैं, तो वह अखिलेश यादव के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा। जिसका सीधा असर चुनाव पर दिखाई देगा।
क्या है नसीमुद्दीन की सबसे बड़ी टेंशन?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी जानते हैं कि सपा पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक मुस्लिम चेहरों से भरी हुई है। मुस्लिम नेताओं के इस बड़े ग्रुप में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें कुछ अलग करना होगा। वहीं, अखिलेश यादव के लिए नसीमुद्दीन के बेटे अफजल सिद्दीकी को स्थापित करना कोई बड़ी बात नहीं है।
आजम से होगा नसीमुद्दीन का टकराव?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री के साथ ही यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि क्या उन्हें सपा के ताकतवर नेता आजम खान के विकल्प के तौर पर लाया गया है। नसीमुद्दीन भले ही आजम खान की तरह मुस्लिम वोट बैंक में कोई आम पसंद न रहे हों, लेकिन उनका एक अलग असर है। आजम से उनका टकराव भी गैरमुमकिन है।
यह भी पढ़ें: शंकराचार्य विवाद में अकेले पड़े योगी, दूसरे डिप्टी CM ने भी छोड़ दिया साथ? बृजेश पाठक के बयान से आया नया तूफान
सियासी पंडित मानते हैं कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का स्वभाव बहुत विनम्र है। इसलिए वह आजम खान से किसी टकराव के बजाय को-ऑपरेटिव रवैया अपनाएंगे। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का असर भी आजम खान के मुरादाबाद डिवीजन से अलग है। बाकी सपा में उनकी एंट्री का नफा-नुकसान क्या होगा? इसका सही जवाब तो 2027 का चुनाव ही दे पाएगा।
Azam alternative or owaisi counter nasimuddin entry may reshape samajwadi party politics
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