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नवभारत विशेष: अकेले पड़ते ट्रंप को याद आए प्रधानमंत्री मोदी, जरूरत पड़ने पर मदद का ऑफर दिया
- Written By: अंकिता पटेल
Trump Modi Relations: ट्रंप के मोदी और भारत को लेकर दिए बयान के बाद भारत-अमेरिका संबंधों, वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा साझेदारी को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं।

ट्रंप बयान, मोदी संबंध, भारत-अमेरिका रिश्ते,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Trump India Support Statement: ट्रंप ने कहा, ‘आई लव प्राइम मिनिस्टर मोदी और यह भी, इंडिया कैन काउंट ऑन मी यानी मुझ पर भरोसा रखों में आपके साथ हूं या जरूरत पड़ने पर मैं आपकी मदद करूंगा।” राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब वह अपनी मनमानी नीतियों के कारण पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ गए हैं। आज के समय में यूरोप उनके साथ नहीं है, नाटी ने स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि ईरान-अमेरिका जंग से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। रूस पहले से ही अमेरिका का कठिन प्रतिद्वंदी है, ताबूत में आखिरी कील चीन ने तब ठोंक दी है, जब उसने कहा होर्मुज मामले में वह ईरान की सम्प्रभुता का सम्मान करता है। यही वजह है कि अपनी चीन यात्रा से लौटने के बाद से ट्रंप उखड़े उखड़े नजर आ रहे हैं। ‘अमेरिका फस्र्ट’ की अकड़भरी नीति अब कई देशों को ‘अमेरिका अलोन’ जैसी लगने लगी है।
ट्रंप को समझ में आ गया है कि जिस तरह वो चल रहे हैं, अगर वैसे ही चलते रहेंगे तो अमेरिका कहीं का नहीं रहेगा। इसलिए अमेरिका को भारत याद आ रहा है, प्रधानमंत्री मोदी याद आ रहे हैं। क्योंकि अब उन्हें ऐसे साझेदार देश की जरूरत है, जो न केवल सामरिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी लगातार बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हो और सबसे बड़ी बात ये कि राजनीतिक रूप से भी स्थिर ताकत हो। भारत एक साथ ये सभी मांगें पूरी करता है। राष्ट्रपति ट्रंप कह रहे हैं, भारत को जितना तेल, जितनी गैस चाहिए, हम देंगे यानी अमेरिका हमारी ऊर्जा की सारी जरूरतें पूरी करेगा।
भारत की संतुलित कूटनीति: रूस-अमेरिका के बीच रणनीतिक संतुलन जरूरी
एक तरफ रूस हमसे कह रहा है कि जितना तेल या गैस चाहिए, हम देंगे और दूसरी तरफ हूबहू यही शब्द अमेरिका भी बोल रहा है। जाहिर है हममें कोई न कोई ऐसी खूबी तो है ही, जिससे हर मुट चाहता है कि हम उसके पाले में चले जाएं, लेकिन अगर हमें अपनी ताकत बरकरार रखना है, तो हमें बहुत सोच-समझकर दोनों गुटों से एक ऐसी दूरी बनाकर रखना होगा, जिससे कोई भी हमें ब्लैकमेल न कर सके। ट्रंप की राजनीति हमेशा से लेन-देन की रही है, वो रिश्तों को भावनात्मक रणनीति या दूरगामी कूटनीतिक सोच के आधार पर नहीं बनाते, उनकी रणनीति का मजबूत पक्ष उपयोगितावादी होता है।
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भारत ट्रंप के लिए केवल एक बड़ा बाजार नहीं बल्कि एक रणनीतिक सहारा भी बन जाता है। पिछले दो दशकों से जब से भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बड़ी है, तो हमारे लिए रूस के साथ-साथ अमेरिका की भी जरूरत महसूस हुई है। नई तकनीक, नया बाजार और विकास की नई ऊंचाईयों के लिए हमें अमेरिका और दूसरे पूंजीवादी देशों की तरफ देखना ही है। भारत अमेरिका के डराने, धमकाने और न चाहने के बावजूद रूस से तेल लेता रहा है।
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रूस हमारी पुरानी रक्षा जरूरतें पूरी करता रहा है। लेकिन एक तरफ आज इसकी जहां तकनीक पुरानी पड़ गई है, वहीं उसके चीन के साथ जो घनिष्ठ रिश्ते बनते जा रहे हैं, उसके चलते यह आशंका तो रखनी ही होगी कि चीन और भारत की किसी मुठभेड़ के समय वह तटस्थ रह सकता है। ऐसे में हमें अमेरिका का साथ चाहिए, रूस हो या अमेरिका किसी के भी लुभावने प्रलोभनों पर पूरी तरह से उसके पक्ष में हमें नहीं जाना चाहिए, हमें अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर होने की बजाय सारे रास्ते खुले रखकर एक ऐसा संतुलन बनाकर चलना होगा कि निकट भविष्य में जब तक हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर नहीं हो जाते, कोई भी देश हमें ब्लैकमेल न कर सके।
जरूरत पड़ने पर मदद का ऑफर दिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिल्ली में आयोजित अमेरिकी दूतावास के कार्यक्रम में अचानक लाइव कॉल करके जिस तरह से भारत और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की झड़ी लगा दी, उसने केवल एक दोस्ताना कूटनीतिक क्षण ही नहीं बनाया, बल्कि बदलती विश्व राजनीति का एक गहरा संकेत भी दिया।
लेख-विजय कपूर के द्वारा
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