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क्या विधेयक पर मंजूरी अनिश्चितकाल तक रोकी जा सकती है अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की भूमिका
President Draupadi Murmu: क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी विधेयक को स्वीकृति या अस्वीकृति देने में अनिश्चित काल तक विलंब कर सकते हैं? ऐसे प्रश्न न्यायालय को केंद्र सरकार के वकीलों से पूछने चाहिए।
- Written By: दीपिका पाल

अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की भूमिका (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: जब राष्ट्रपति अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगते हैं, तो क्या संवैधानिक संस्था के रूप में न्यायालय अनिश्चित काल तक अपनी राय देने में विलंब कर सकता है? इसी तरह, किसी मुकदमे में सुनवाई पूर्ण हो जाने के बाद, क्या न्यायालय अनिश्चित काल तक निर्णय सुरक्षित रख सकता है? और यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी विधेयक को स्वीकृति या अस्वीकृति देने में अनिश्चित काल तक विलंब कर सकते हैं? ऐसे प्रश्न न्यायालय को केंद्र सरकार के वकीलों से पूछने चाहिए।क्योंकि संविधान में न तो राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राय देने की कोई समयसीमा है और न ही सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय देने की समयसीमा।
इसी तरह राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए भी, विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है।इस मुद्दे को उठाने का कारण यह है कि वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल केस के संदर्भ में अनुच्छेद 200 और 201 से जुड़ी संवैधानिक चिंताओं पर 14 प्रश्नों को लेकर सुनवाई चल रही है।
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तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों पर लंबे समय तक निर्णय नहीं लिया, जिसके चलते राज्य सरकार ने इसे संवैधानिक उल्लंघन और प्रशासन में बाधा बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।8 अप्रैल 2025 को न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से ही कार्य करने के लिए बाध्य हैं।वे अपने विवेक से निर्णय नहीं ले सकते।
मंत्रिपरिषद की सलाह से चलाना होगाः राज्यपाल द्वारा विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजना ‘कानूनी व्याख्या’ के रूप में बताया गया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के पास ‘पूर्ण वीटो’, ‘पॉकेट वीटो’ या अनिश्चितकालीन विलंब करने का विकल्प नहीं है।वे केवल मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य कर सकते हैं।यदि विधानसभा किसी विधेयक को पुनः पारित करती है, तो राज्यपाल को उसे स्वीकृति देनी होगी।न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह के विरुद्ध कार्य कर रहे हों, तो उन्हें तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए और यदि वही विधेयक फिर से प्रस्तुत किया जाए, तो उस पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए।अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए।देरी की स्थिति में राज्य सरकार को कारण स्पष्ट करना होगा।
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सुप्रीम कोर्ट का रूखः
इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका और जिम्मेदारियों की रूपरेखा तय की है।लंबित विधेयकों के संदर्भ में ‘स्वीकृति मानी गई’ (डीम्ड एसेंट) की संकल्पना प्रस्तुत की गई, जिससे लंबे समय तक निर्णय न लेने की स्थिति में विधेयक को स्वीकृत मान लिया जाएगा।न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि राज्यपाल केवल संवैधानिक प्रमुख हैं, न कि राजनीतिक व्यक्ति।उन्हें कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। वर्तमान में न्यायमूर्ति बी।आर।गवई की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी.एस।नरसिंह और अतुल सरन की खंडपीठ में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका व शक्तियों से संबंधित सुनवाई में निम्नलिखित प्रमुख प्रश्न हैं: अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियां और सीमाएं क्या हैं? जहां संविधान में समयसीमा या प्रक्रिया नहीं दी गई है, वहां क्या सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक शक्तियों पर नियंत्रण रख सकता है? देखना है वह क्या निर्णय देता है।
लेख-अंबादास मोहिते के द्वारा
Role of governor under article 200
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