
दलबदल (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, जबसे हमने अपने मतलब के लिए पार्टी बदली है, लोग हमें दलबदलू कहकर चिढ़ाते हैं। कुछ तो हमें रंग बदलने वाला गिरगिट भी कहते हैं इससे बड़ा दुख होता है।’ हमने कहा, ‘लोगों के कहने की परवाह मत कीजिए। राजनीति में सक्रिय बने रहना है तो कपड़ों के समान पार्टी बदलते रहिए। कभी गले में तिरंगी दुपट्टा डालते थे, अब भगवा डालकर शान से चलिए। जीवन में यह सिद्धांत रखिए कि जिधर दम, उधर हम ! जैसे गिद्ध शिकार पर झपटता है वैसे ही आप भी जहां अवसर, पद या धन मिले, लपक जाइए। एक खूंटे से कब तक बंधे रहेंगे?’
पड़ोसी ने कहा, ‘हमारे पुराने साथी आरोप लगाते हैं कि हम बेईमान हैं। हम में पार्टी के प्रति निष्ठा नहीं है। छुट्टे सांड की तरह कहीं भी मुंह मारते हैं। हमें मौकापरस्त और स्वार्थी कहा जाता है।’ हमने कहा, ‘यह बहुत मामूली बात है। इसे दिल पर मत लीजिए। एक कान से सुनकर दूसरे से उड़ा दीजिए। राजनीति में हैं तो पतली नहीं, मोटी चमड़ी रखिए। जब मौसम बदलता है, दिन-रात बदलते हैं, हर साल कैलेंडर बदल जाता है, लोग नौकरी और मकान बदलते हैं तो पायजामे की तरह पार्टी भी बदलते रहिए। कभी पूंजीवादी बन जाइए तो कभी समाजवादी, कभी सेक्यूलर तो कभी सांप्रदायिक ! कभी गांधीवादी तो कभी संघवादी ! इससे आपको फ्रेशनेस या ताजगी का अनुभव होगा। जब सांप केंचुली बदलता है तो आप भी पार्टी बदलते रहिए।’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, जब हम एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में जाते हैं तो हमारे मन में बदलाव के गीत गूंजते हैं जैसे कि बदली-बदली दुनिया है मेरी, जादू है ये क्या तेरे नैनों का! बदल के मेरी जिंदगानी, कहीं बदल ना जाना सनम ! इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नीयत ठीक नहीं! दुनिया बदल गई मेरी दुनिया बदल गई! देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान!’ हमने कहा, ‘नई पार्टी में जब आपको चुनाव लड़ने की उम्मीदवारी मिल जाए तो आपको गुनगुनाना चाहिए- झूम-झूम कर गाओ आज, गाओ खुशी के गीत !’
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






