स्वास्थ्य बीमा पर 18% GST क्यों? केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी की मांग सही

पुरानी आयकर प्रणाली में प्रावधान था कि जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा पर खर्च की गई रकम पर इनकम टैक्स नहीं लगता था। नई टैक्स प्रणाली में ये रियायतें समाप्त कर दी गईं। मध्यमवर्गीयों के लिए निवेश कर टैक्स बचाने का रास्ता ही नहीं रहा। बीमा एजेंटों को भी दिक्कतें जा रही हैं।
Nitin Gadkari demands the removal of 18% GST on health insurance
(डिजाइन फोटो)
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नवभारत डेस्क: जीवन के अधिकार के समान स्वास्थ्य का अधिकार भी होना चाहिए? विदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा है जो इलाज की गारंटी देती है। वहां निश्चित तारीख पर लोग अस्पताल जाकर अपना स्वास्थ्य परीक्षण कराते हैं चाहे कोई शिकायत हो या न हो। जांच से शुरू में ही बीमारी का पता चल जाता है। भारत में स्वास्थ्य बीमा या हेल्थ इंश्योरेंस तो है लेकिन उसे कम लोग कराते हैं। इसे समय पर प्रीमियम अदा करते हुए कायम रखना पड़ता है। कारपोरेट में अनिवार्य रूप से वेतन से स्वास्थ्य बीमा की रकम काट ली जाती है। इसका फायदा तब मिलता है जब कोई आपरेशन कराना हो या बड़ी बीमारी घेर ले। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस निकाला लेकिन जरूरत ही नहीं पड़ी। वे पैसे बेकार जाने की शिकायत करते हैं। वास्तव में इलाज महंगा होने की वजह से स्वास्थ्य बीमा हर व्यक्ति की जरूरत होनी चाहिए।

यद्यपि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के बजट पर सत्तापक्ष में से किसी ने भी आपत्ति नहीं उठाई लेकिन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से रहा नहीं गया। उन्होंने वित्तमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि हेल्थ इंश्योरेंस पर लिया जानेवाला 18 प्रतिशत जीएसटी मध्यम वर्ग के लिए अन्यायपूर्ण है। नागपुर के जीवन बीमा निगम के कर्मचारियों ने इस मुद्दे पर गडकरी को प्रतिवेदन दिया था। गडकरी ने सिर्फ सहानुभूति व्यक्त कर यह मुद्दा छोड़ना उचित नहीं समझा बल्कि इसकी सार्थकता को देखते हुए वित्तमंत्री को पत्र लिखा और मांग की कि यह टैक्स वापस लिया जाए। बेहतर होता यदि गडकरी इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखते क्योंकि निर्मला सीतारमण तो अपनी मर्जी से ऐसा फैसला नहीं कर पाएंगी। पीएम निर्देश देंगे तभी जीएसटी कम होगा या हटेगा।

जो भी हो, गडकरी ने जनहित में एक सही मुद्दा उठाया है। ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्हें हृदय रोग, कैन्सर घेर लेता है या मोतियाबिंद की सर्जरी करानी होती है। यदि उन्होंने स्वास्थ्य बीमा न कराया हो तो इलाज की रकम जुटाना मुश्किल हो जाता है। हेल्थ इंश्योरेंस की उपयोगिता तभी समझ में आती है। स्वास्थ्य बीमा निकालने से लोग इसलिए भी हतोत्साहित होते हैं क्योंकि प्रीमियम की रकम के साथ उस पर प्रतिवर्ष 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है।

पुरानी आयकर प्रणाली में प्रावधान था कि जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा पर खर्च की गई रकम पर इनकम टैक्स नहीं लगता था। नई टैक्स प्रणाली में ये रियायतें समाप्त कर दी गईं। मध्यमवर्गीयों के लिए निवेश कर टैक्स बचाने का रास्ता ही नहीं रहा। बीमा एजेंटों को भी दिक्कतें जा रही हैं। ग्राहक पूछते हैं जब टैक्स नहीं बचता और ऊपर से भारी टैक्स चार्ज किया जाता है तो स्वास्थ्य बीमा कराने का क्या फायदा! बीमा कर्मचारी संगठन की मांग का गडकरी ने समर्थन किया। अन्य बड़े नेता भी इसके समर्थन में आगे आकर जनता को राहत दिला सकते हैं। लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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