नवभारत संपादकीय: ईरान की चेतावनी से बढ़ी चिंता, कई महीने जारी रह सकता है ऊर्जा संकट

Hormuz Strait Tensions: अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव बना हुआ है। तेल आपूर्ति में बाधा और बढ़ती कीमतों का असर भारत समेत एशियाई देशों पर पड़ रहा है।
Navabharat Editorial: Iran's Warning Heightens Concerns; Energy Crisis Could Persist for Several Months
Iran Oil Supply Disruption( सोर्स: सोशल मीडिया )
Published on
Updated on

Iran Oil Supply Disruption: अमेरिका व ईरान ने 2 सप्ताह का संघर्ष विराम घोषित किया लेकिन इसके बाद भी होर्मुज की खाड़ी को लेकर ईरान की धमकियों के बीच ऊर्जा संकट अभी कई महीनों तक जारी रह सकता है। मार्च में ईरान द्वारा होर्मुज की खाडी से जहाजों का यातायात रोक देने की वजह से क्रूड ऑइल के दाम 50 प्रतिशत बढ़ गए थे।

इस खाड़ी से होकर विश्व के 20 प्रतिशत तेल व एलएनजी की सप्लाई होती है। खाड़ी देशों के उर्जा संयंत्रों पर हमले से भी संकट बढ़ा है। आपूर्ति में रुकावट और मूल्यवृद्धि का बड़ा असर एशिया और खास तौर से भारत पर पड़ा है।

लेबनान पर हो रहे इजराइली हमलों को देखते हुए ईरान ने फिर जहाजों को होर्मुज से दूर रहने की चेतावनी है। जारी की अभी भी युद्धपूर्व कीमतों की तुलना में तेल के दाम 30 प्रतिशत ज्यादा है।

यद्यपि संघर्ष विराम के बाद ईरान ने कहा था कि 2 सप्ताह तक होर्मुज की खाड़ी से जहाजों को सुरक्षित जाने दिया जाएगा लेकिन अब लगता है कि उसने यह मार्ग फिर बंद कर दिया है।

यदि स्थायी तौर पर शांति हो भी गई तो पहले के समान तेल व गैस की पूर्ति शीघ्रता से पुनः बहाल नहीं हो पाएगी। अभी युद्ध विराम अस्थायी है और स्थायी शांति दूर है। यदि स्थिति शांत भी हो जाए तो खाड़ी देशों की युद्ध से क्षतिग्रस्त रिफाइनरी, ऑइलफील्ड, एक्सपोर्ट टर्मिनल तथा एलएनजी प्रक्रिया इकाइयों को सामान्य होने में महीनों लग जाएंगे।

फिर भी इन 2 सप्ताहों में ईरान जिन जहाजों को जाने का रास्ता दे रहा है उससे कुछ राहत जरूर मिलेगी। एक अनुमान के मुताबिक फारस की खाड़ी में अभी 18 करोड़ बैरल क्रूड ऑइल तथा 10 लाख टन से ज्यादा एलएनजी के टैंकर अटके पड़े हैं।

तेल आपूर्ति में आ रहे रुकावट की वजह से मार्च में खाड़ी देशों ने तेल उत्पादन में 75 लाख बैरल प्रतिशत को कटौती कर दी थी। कम उत्पादन के अलावा सप्लाई धीमी होने से तेल के दाम में वृद्धि बनी रहेगी।

युद्ध ने मांग और पूर्ति का समीकरण बिगाड़ कर रख दिया है। अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। भारत चाहता है कि युद्ध पूरी तरह समाप्त होकर यथाशीघ्र स्थिति सामान्य हो जाए। भारत ऊर्जा आयात के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों पर निर्भर है।

सप्लाई प्रभावित होने से दिक्कतें बढ़ रही हैं। उद्योगों व व्यावसायिक उपभोक्ताओं को गैस देने में राशनिंग की जा रही है। यद्यपि भारत अनेक स्रोतों से तेल मंगाता है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम बढ़ने का असर यहां भी होगा।

आशंका है कि विधानसभा चुनाव पूरी तरह निपट जाने के बाद सरकार पेट्रोल-डीजल व गैस के दाम बढ़ा सकती है। भारत प्रतिवर्ष विदेश से 1.82 से लेकर 2 बिलियन बैरल क्रूड ऑइल मंगवाता है।

यदि प्रति बैरल 1 डॉलर भी दाम बढ़े तो उसका असर पड़ेगा। सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के उद्देश्य से पिछले दिनों पेट्रोल व डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपए प्रति लीटर घटा दी थी।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com