
राजनीति में यही बड़ा कष्ट (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, जब देश आजाद हुआ था तब प्रथम प्रधानमंत्री पं। जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि भ्रष्टाचारियों को बिजली के खंबे से लटकाकर फांसी दे देनी चाहिए। अंग्रेजी में उनके शब्द थे- करप्ट शुड बी हैंग्ड बाय फर्स्ट लैंप पोस्ट ! इसके बाद बिजली के खंबे तरसते रह गए, एक भी भ्रष्टाचारी को फांसी नहीं हुई! इसके बाद 2 बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री और अनेक वर्षों तक केंद्रीय गृहमंत्री रहे गुलजारीलाल नंदा ने देश में सदाचार आंदोलन चलाया था। उनकी सभाओं में 40-50 से ज्यादा लोग नहीं जाते थे। जब नंदा का निधन हुआ तो उन पर मकान का कई महीनों का किराया बकाया था। ईमानदार गृहमंत्री स्वयं का गृहप्रवेश भी नहीं कर पाए ! भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों ने 1 नोट की बजाय 4 नोट मांगते हुए बेशर्मी से कहा कि सदा 4 की सलाह नंदा ने दी है।’
हमने कहा, ‘विकास के साथ भ्रष्टाचार जुड़ा हुआ है। मंत्री,अधिकारी व पूरा महकमा पैसे खाता है तब कहीं जैसा-तैसा विकास हो पाता है। भारत के विकास में भ्रष्टाचार का योगदान विषय पर पीएचडी की जा सकती है। जब विकास नहीं हुआ था तो आजादी के समय 1 रुपया और 1 डॉलर बराबर थे। आज लगभग 90 रुपए का 1 डॉलर हो गया है। विकास की कीमत इस तरह चुकानी पड़ती है। नेता मस्त हैं और किसान हालात से पस्त होकर आत्महत्या कर रहे हैं।’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हैरत की बात है कि महायुति सरकार के नेताओं ने महापालिका चुनाव प्रचार के दौरान एक-दूसरे के भ्रष्टाचार की पोल खोली। अजीत पवार ने कहा कि 1995-99 में शिवसेना-बीजेपी की सरकार थी। चुनाव हारने से सत्ता छिन गई। फिर कांग्रेस-एनसीपी की सरकार बनी जिसमें मुझे कृष्णा घाटी विकास निगम की जिम्मेदारी मिली। तब पुरंदर लिफ्ट इरिगेशन की लागत 330 करोड़ बताई गई थी।
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मैंने पिछली सरकार की इस योजना को रद्द कर दिया और नया टेंडर 220 करोड़ में पास किया। मुझे मालूम पड़ा कि उसमें 100 करोड़ रुपए पार्टी फंड के नाम पर तथा 10 करोड़ अधिकारियों की रिश्वत के नाम पर थे। बीजेपी के भ्रष्टाचार की फाइल आज भी मेरे पास मौजूद है। इस पर शिवसेना नेता शाहजी बापू पाटिल ने कहा कि पाचगांव में टनेल बनाने के लिए बीजेपी ने 350 करोड़ का टेंडर निकाला था जबकि अजीत ने इसकी लागत बढ़ाकर 1,850 करोड़ रुपए कर दी। इनके भी हाथ साफ नहीं हैं।’ हमने कहा, ‘भ्रष्टाचार में तेरी भी चुप मेरी भी चुप रहनी चाहिए। आखिर बिल्ली भी तो आंख मूंद कर दूध पीती है।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






