
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: बारामती में पिछले दिनों एक जनसभा चल रही थी। कमोबेश महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिका का प्रचार अपने पूरे शबाब पर था। प्रचार के आखिरी 1-2 दिन बचे थे। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ को बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहे अजीत पवार ने एक सभा में अचानक अपना लहजा कुछ गंभीर कर दिया। कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बोले… ये राजनीति बहुत ही उटपटांग हो गई है।
कुछ काम-धंधा करो, अच्छे से रहो… बच्चों को अच्छा पढ़ाओ- लिखाओ और हर तरह के नशे से दूर रहो। उनके यह शब्द कार्यकर्ताओं के लिए घर के किसी बुजुर्ग के ज्ञान जैसे ही थे। आखिर यह कला भी अजीत ने अपने राजनीतिक गुरू और चाचा शरद पवार से सीखी थी। अब जब अजीत पवार नहीं हैं तो हर कार्यकर्ता उनके इन शब्दों को याद करते हुए कह रहा था कि क्या उनको अपने अंतिम समय का आभास हो गया था।
बुधवार को सुबह महाराष्ट्र में उस समय भावनात्मक भूचाल आ गया जब लोगों को पहली खबर यह मिली कि उनके अपने उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का प्लेन क्रैश हो गया और उनके सहित 5 लोग गंभीर जख्मी है। कुछ ही पल भर बाद यह खबर मिली कि किसी को भी बचाया नहीं जा सका। वैसे हम महाराष्ट्रीयन लोगों का यह मूल स्वभाव ही है कि हम जाने-अनजाने में होने वाली मौतों के लिए शोक करते ही हैं।
लेकिन जब खबर अजीत अर्थात महारष्ट्र के प्रिय दादा के अकाल मौत की हो तो हर व्यक्ति के दिल में गहरी चोट लगी। इसका कारण भी है। खुद अजीत पवार जो अपने चाचा बड़े पवार की उंगलियां पकड़कर पिछले साढ़े चार दशक से महाराष्ट्र के जनता पर अपनी छाप छोड़ते रहे। दादा की अकाल मौत से अब उनके समर्थक, उनको जानने वाले और जो नहीं जानते हैं वो भी, एक ही सवाल कर रहे हैं कि दादा, आखिर आपको जाने की इतनी जल्दी क्या थी।
2014 की राजनीति के बाद महाराष्ट्र और राष्ट्र की राजनीति में बहुत कुछ बदल गया। ऐसा नहीं है कि इसके पहले बदले की राजनीति का दौर नहीं था, लेकिन बीते 11 वर्षों में जिस तरह से विपक्ष मुक्त राष्ट्र और महाराष्ट्र के एजेंडे पर काम हुआ उतना पहले कभी नहीं हुआ। महाराष्ट्र भी इससे अछूता नहीं रहा। यह पहला अवसर था जब 2014 में बीजेपी ने अपने दम पर विधानसभा में 123 सीटें हासिल की थी।
फडणवीस सरकार बनने के बाद शरद पवार वाली राकां उनको बाहर से समर्थन देने तैयार थी, लेकिन बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगी उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना को साथ ले लिया। अपने चाचा की तरह हमेशा सत्ता में रहते हुए ‘जनसेवा’ की चाहत रखने वाले छोटे पवार किसी भी सूरत में सत्ता से दूर रहने को तैयार नहीं था। उनके राजनीतिक दुश्मन तो यहां तक कहते थे कि सिंचाई घोटाला और उस जैसे अन्य घोटाले से बचने के लिए वे बीजेपी से हाथ मिलाने को परेशान थे। सच्चाई अब कभी उजागर नहीं होगी।
बहरहाल 2017 में और बाद में फडणवीस के साथ 84 घंटे की सरकार बनाने वाले अजीत ने कई बार यह प्रयास किया कि वो बीजेपी के साथ चले जाएं, उद्धव ठाकरे के कारण महाविकास आघाड़ी जब बनी तो वे फिर डीसीएम बन गए। 2022 में चले ऑपरेशन लोटस के बाद से अजीत असहज हो गए और खुला विद्रोह करके वो महायुति में शामिल हो गए। कहने को तो वो बीजेपी के साथ सत्ता में शामिल हुए थे, लेकिन उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया।
शिवसेना तोड़कर एकनाथ शिंदे ने जब बगावत की थी तब उसकी पृष्ठभूमि भी ईडी-सीबीआई का डर बताया गया था। शिंदे अपने आपको बाल ठाकरे 2 समझने लगे थे, लेकिन बाल ठाकरे जिस तरह अपनी शर्तों पर रहे वैसे उनका रुतबा नहीं रहा। बीजेपी के कई नेताओं की तरह शिंदे भी अपने आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीकी और असली हिंदुत्ववादी नेता वाली छवि बनाने का प्रयास करते रहे। महाराष्ट्र विधानमंडल का जब भी नागपुर में शीतकालीन अधिवेशन होता है, तब किसी भी एक दिन संघ मुख्यालय पर पूरी सरकार मत्था टेकने जाती है। यह काम अजीत पवार ने कभी नहीं किया। वे यह कहते रहे कि जो जनता उनको चुनकर देती है, उसका काम होता रहे और विकास करने वाली पार्टियां-सरकार और नेताओं को जनता अपना समर्थन देती है।
अजीत का अपना एक स्वभाव था। चाचा की ही तरह 18-18 घंटे काम करने की उनकी आदत थी। दिल के भोले, लेकिन मिजाज सख्त रखते थे। कोई लाग-लपेट उनको नहीं आता था। मौके पर चौका मारना उनकी फितरत थी। राजनीति में वैसे किसी से दुश्मनी नहीं मोल लेते थे, लेकिन किसी से दुश्मनी मोल ली तो उसे निपटाने में भी कभी पीछे नहीं रहे।
अनंतराव पवार के पुत्र होने के बाद भी आधी दुनिया उनके भीतर शरद पवार की परछाई देखती आई। जैसा कि अधिकांश राज-घरानों में होता है, वैसा ही पवार-वंश में भी हुआ। राजनीतिक विरासत का बंटवारा कैसे हो, इसके लिए पवार परिवार में भी महाभारत हुआ। 2014 के बाद की राजनीति में ‘सत्ता के साथ रहें या जेल में’, इस घोषवाक्य का लाभ अजीत को ज्यादा मिला।
2024 में महायुति की सरकार में बीजेपी की सुनामी का लाभ भी उनको मिला। चाचा को विधानसभा में पटकनी देने के बाद बारामती और पवार-परिवार में दूरियां दिखने लगी थी। महाराष्ट्र के मनपा चुनाव घोषित हुए और मजबूरी में दोनों चाचा-भतीजे को एक होना पड़ा। पारिवारिक दूरियां घटीं कलह की बर्फ पिघली, गली के चुनाव में बड़े पवार का जाना ठीक नहीं था, इसलिए बहन सुप्रिया सुले और भतीजे रोहित पवार ने अजीत का साथ दिया, बीजेपी से मुकाबला था।
अपने ही गढ़ पुणे और पिंपरी-चिंचवड़, जिसके शहरीकरण की मिसाल देकर महाराष्ट्र के अन्य शहरों का विकास होता है, में अजीत हार गए, सिर्फ हारे नहीं, बुरी तरह हार गए, बीजेपी में जाने के बाद से भी वो उस सच्चाई को जान गए थे कि यहां सिर्फ नदी समुद्र वाला कानून चलता है। हर नदी को समुद्र में समा जाना है। मनपा चुनाव की बुरी पराजय के दूसरे ही दिन वे अपने चाचा के घर पहुंचे। हमेशा जीत-हार के बाद वही उनके भरोसे की मंजिल भी थी। चाचा ने भरोसा दिया और जिला परिषद के चुनाव साथ लड़ने की घोषणा भी कर दी।
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यह भी तय हुआ घड़ी चुनाव चिन्ह जिसे पाने हथियाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई लड़ी गई, उसे तुतारी के साथ बारी-बारी से उपयोग करेंगे। अब बस आखिरी दीवार गिरनी बाकी थी। जिला परिषद चुनाव के बाद वह दीवार भी गिर ही जाती। शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत की बात शायद सच होती कि अजीत पवार जल्दी ही महाविकास आघाड़ी में आने वाले हैं।
नियति को कुछ और मंजूर था। संभवतः अजीत अपने चाचा को इस बात के लिए मना चुके थे कि वे ही उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। सब कुछ इंसान के बस की बात नहीं होती। अब एक बार फिर शरद पवार के कंधों पर ही सब कुछ आगे जाएगा। अजीत के पार्थिव से लेकर राकां कार्यकर्ताओं के भविष्य तक। इस बात का जवाच मिलना मुश्किल ही है कि अजीत दादा, आखिर जाने की इतनी जल्दी क्या थी।।?
लेख-संजय तिवारी के द्वारा
sanjayiwari@navabharatmedia.com






