(सौजन्य सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क : हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा के दिन हर साल विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है। यह हर साल उसी दिन मनाया जाता है जिस दिन रक्षा बंधन का त्योहार पड़ता है। इसलिए इस बार संस्कृत दिवस 19 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन को मनाने के पीछे उद्देश्य इस प्राचीन और महत्वपूर्ण भाषा को लेकर जागरूकता बढ़ाना और इसका प्रचार करना है।
सबसे प्राचीन ज्ञात भाषाओं में से एक संस्कृत भाषा को देववाणी भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह प्राचीन भाषा भारतीय महाद्वीप के भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा परिवार से आई है। हमारे अधिकांश धार्मिक ग्रंथ जैसे- वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, भागवद् गीता आदि इसी भाषा में लिखे गए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस भाषा का महत्व कितना अधिक है।
संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है। यह भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी की जननी कही जाती है क्योंकि इसी से हिंदी की उत्पत्ति हुई है। न केवल हिंदी, बल्कि अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भाषा के कई शब्द भी संस्कृत से लिए गए हैं। संस्कृत को वैज्ञानिक भाषा भी माना जाता है। इसे लेकर नासा का कहना है कि भविष्य के सुपर कम्प्यूटर इसी भाषा पर आधारित होंगे। इसके अलावा हमारे अधिकांश धार्मिक ग्रंथ, वेद, पुराण, उपनिषद, गीता आदि इसी भाषा में लिखे हुए मिलते हैं। हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा आदि में संस्कृत का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
संस्कृत भाषा की उत्पत्ति भारत में लगभग 3500 साल पहले की मानी जाती है जो भारतीय महाद्वीप के भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा परिवार से आई। सबसे पहले 1969 में विश्व संस्कृत दिवस मनाया गया। इस दिन देशभर में व्याख्यान, गोष्ठियां और बैठकों आदि का आयोजन किया जाता है। आम जन-जीवन में संस्कृत भाषा का प्रयोग लगातार कम होता जा रहा है, इसलिए संस्कृत के महत्व को बढ़ाने के लिए इस दिन को मनाया जाता है।
समाज में संस्कृत के कम होते चलन को फिर से बढ़ाने और इस प्राचीन भाषा के पुनरुत्थान के लिए इस दिवस को मनाया जाता है। इस दिन इस भाषा को लेकर जागरुकता फैलाने और लोगों को इसका महत्व समझाने के लिए देशभर समेत पूरे विश्व में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। आज दुनिया के लगभग 40 देशों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। भारत के भी 120 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है।
विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक ऋग्वेद संस्कृत में लिखी गई है। भारत में अरबों के आक्रमण से पहले संस्कृत ही बोली जाती थी। यह तब राष्ट्रभाषा हुआ करती थी। कर्नाटक के एक गांव मट्टुर में तो आज भी संस्कृत ही आम बोलचाल में प्रयोग की जाती है। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार संस्कृत बोलने से जुबान में लचीलापन बढ़ता है। इतना ही नहीं एक अध्ययन के अनुसार संस्कृत बोलने से बीपी, शुगर और कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। संस्कृत बोलने से नर्वस सिस्टम एक्टिव होता है जिससे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।
इस भाषा को वैज्ञानिक भाषा इसलिए भी माना गया है क्योंकि संस्कृत वाक्यों में जब शब्दों का क्रम आगे पीछे कर दिया जाता है तब भी इनका अर्थ बदलने की सम्भावना न के बराबर रहती है। इसके इस गुण को नासा ने भी माना है। दरअसर अंतरिक्ष में मैसेज भेजने पर अक्सर उनके शब्दों का क्रम बदल जाता है, जिससे मैसेज का अर्थ ही बदल जाता था। कई भाषाओं के प्रयोग के बाद केवल संस्कृत इस मामले में खरी उतरी। इसमें मैसेज भेजने पर वाक्य उलटे हो जाने पर भी अर्थ नहीं बदला।